सुनवर्षा से संसद तक गरीबों, वंचितों और कमजोरों की आवाज बने सांसद जितेन्द्र दोहरे

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जितेन्द्र दोहरे का जीवन संघर्ष, सादगी और जनसेवा की ऐसी कहानी है, जो यह साबित करती है कि यदि इंसान के भीतर मेहनत, ईमानदारी और समाज के लिए कुछ करने का जज्बा हो तो वह एक छोटे से गांव से निकलकर देश की संसद तक पहुंच सकता है। इटावा लोकसभा क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के सांसद बने जितेन्द्र दोहरे आज लाखों लोगों के लिए उम्मीद और संघर्ष का प्रतीक हैं। उनका पूरा जीवन आम जनता के दुख-दर्द को समझने और उनके अधिकारों के लिए लड़ने में बीता है।

इटावा के ग्राम सुनवर्षा की मिट्टी में जितेन्द्र दोहरे का जन्म 06 फरवरी 1970 को एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय रामौतार दोहरे और माता स्वर्गीय विटानी देवी ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को सच्चाई, स्वाभिमान और मेहनत का रास्ता सिखाया। बचपन से ही उन्होंने अपने माता-पिता को संघर्ष करते देखा। परिवार की परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन उन्हीं कठिनाइयों ने उनके भीतर गरीब और कमजोर लोगों के लिए संवेदना पैदा की।

गांव की गलियों, खेतों और साधारण जीवन के बीच बड़े हुए जितेन्द्र दोहरे ने बचपन से ही समाज में फैली असमानता और गरीबों की तकलीफों को महसूस किया। वह अक्सर देखते थे कि गरीब और कमजोर लोगों की आवाज सुनने वाला कोई नहीं होता। यही पीड़ा उनके मन में समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा बन गई। उन्होंने हमेशा अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सच का साथ देने का संकल्प लिया।

उनके जीवन में परिवार हमेशा उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा। 02 जून 1998 को उनका विवाह पवित्रा देवी से हुआ, जो अभी महेवा विकास खंड की ब्लाक प्रमुख है। पति-पत्नी दोनों ने मिलकर समाजसेवा और विकास को अपना लक्ष्य बनाया। उनके परिवार में पुत्र अनुराग दोहरे सहित तीन बेटियां हैं। जितेन्द्र दोहरे हमेशा कहते हैं कि परिवार का सहयोग ही उन्हें हर संघर्ष में मजबूती देता रहा है।

लोकसभा की शिक्षा, महिला, बाल, युवा एवं खेल समिति के सदस्य सांसद जितेन्द्र दोहरे के पुत्र अनुराग दोहरे भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए समाजसेवा के कार्यों में गहरी रुचि रखते हैं। तकनीकी क्षेत्र में बी.टेक की डिग्री प्राप्त अनुराग दोहरे आधुनिक सोच और सामाजिक संवेदनशीलता का सुंदर संगम हैं। युवाओं के बीच उनकी सक्रियता और आम लोगों की समस्याओं को समझने का उनका सरल स्वभाव उन्हें तेजी से लोकप्रिय बना रहा है। वह पूरी लगन और समर्पण के साथ लोगों के बीच रहकर सेवा कार्यों में जुटे रहते हैं तथा समाज के जरूरतमंद और कमजोर वर्ग की सहायता के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने बहुजन समाज पार्टी से की। संगठन में रहते हुए उन्होंने गांव-गांव जाकर गरीबों, दलितों और पिछड़ों की आवाज उठाई। उनकी मेहनत और जनता के बीच मजबूत पकड़ को देखते हुए उन्हें जिला महासचिव, जिला अध्यक्ष और मंडल समन्वयक जैसे महत्वपूर्ण दायित्व मिले। उन्होंने राजनीति को कभी सत्ता का माध्यम नहीं माना, बल्कि समाज के दबे-कुचले लोगों को सम्मान दिलाने का रास्ता समझा।

बहुजन समाज पार्टी में रहते हुए जितेन्द्र दोहरे ने हजारों लोगों के सुख-दुख में भागीदारी निभाई। चाहे किसी गरीब परिवार की मदद करनी हो, किसी बीमार व्यक्ति का इलाज कराना हो या किसी जरूरतमंद को सरकारी योजना का लाभ दिलाना हो, वह हमेशा सबसे आगे दिखाई दिए। यही वजह रही कि धीरे-धीरे वह जनता के बीच भरोसे का नाम बन गए।

वर्ष 2020 में उनके राजनीतिक जीवन में नया मोड़ आया जब उन्होंने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में उन्होंने समाजवादी विचारधारा के साथ आगे बढ़ने का फैसला लिया। इसके बाद उन्होंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ पार्टी को मजबूत करने का कार्य शुरू किया।

समाजवादी पार्टी में आने के बाद जितेन्द्र दोहरे लगातार जनता के बीच सक्रिय रहे। वह हर गांव, हर मोहल्ले और हर वर्ग के लोगों से जुड़े रहे। उन्होंने लोगों की समस्याओं को सुना और उन्हें हल कराने के लिए संघर्ष किया। उनकी सादगी, विनम्रता और सहज व्यवहार ने उन्हें बहुत कम समय में जनता के दिलों तक पहुंचा दिया।

वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव उनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष बनकर सामने आया। इटावा सीट पर भारतीय जनता पार्टी पहले लगातार दो चुनाव जीत चुकी थी और अधिकांश लोग यही मान रहे थे कि इस बार भी भाजपा की जीत होगी। लेकिन जितेन्द्र दोहरे ने हार मानने के बजाय जनता के बीच भरोसे की लड़ाई लड़ी।

उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से मुलाकात की, बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया, युवाओं से संवाद किया और गरीबों के दर्द को अपनी आवाज बनाया। चुनाव प्रचार के दौरान उनकी सादगी और जनता से जुड़ाव लोगों के दिलों को छू गया। परिणाम आने पर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी राम शंकर कठेरिया को 58,419 मतों के बड़े अंतर से हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। यह केवल उनकी चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि आम जनता के विश्वास की जीत थी।

उनकी जीत ने इटावा की राजनीति में नया इतिहास लिख दिया। वर्षों से मजबूत मानी जा रही राजनीतिक धाराओं को उन्होंने अपने संघर्ष और जनता के प्यार के दम पर बदल दिया। उनकी जीत ने यह साबित किया कि यदि नेता जनता के बीच रहकर काम करे तो जनता उसे सिर आंखों पर बैठा लेती है।

सामाजिक कार्यों में भी जितेन्द्र दोहरे का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। महेवा विकास खंड कार्यालय परिसर में प्रदेश की सबसे बड़ी बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा की स्थापना उनके प्रयासों से हुई। उन्होंने कई अंबेडकर पार्कों का निर्माण और सौंदर्यीकरण कराया ताकि आने वाली पीढ़ियां सामाजिक न्याय और समानता के विचारों से प्रेरणा ले सकें।

उन्होंने इटावा के गरीब और जरूरतमंद लोगों को प्रधानमंत्री राहत कोष से करोड़ों रुपये की आर्थिक सहायता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इटावा कचहरी में अधिवक्ता भवन के निर्माण में भी उनका विशेष योगदान रहा। किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति को खाली हाथ वापस न भेजना उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।

महेवा विकास खंड में उनकी पत्नी के प्रमुख कार्यकाल के दौरान विकास कार्यों की नई तस्वीर देखने को मिली। गांवों में सड़कें बनीं, मार्ग प्रकाश की व्यवस्था हुई, सार्वजनिक स्थानों पर शीतल जल की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। सांसद बनने के बाद भी उन्होंने सड़क, प्रकाश व्यवस्था, खुले व्यायाम स्थल, शुद्ध पेयजल संयंत्र, यात्री प्रतीक्षालय, सार्वजनिक भवन और अंबेडकर पार्कों जैसी अनेक योजनाओं को मंजूरी दिलाई। इटावा और अछल्दा में रेलवे ऊपरी पुल और पैदल पुल की स्वीकृति भी उनके प्रयासों का परिणाम मानी जाती है।

जितेन्द्र दोहरे का पूरा जीवन संघर्ष, सच्चाई और जनसेवा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने हमेशा अपने माता-पिता से मिली सीख को जीवन का आधार बनाया। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, गरीबों के साथ खड़ा रहना और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना ही उनके जीवन का उद्देश्य रहा है। एक छोटे से गांव से निकलकर संसद तक पहुंचने वाला उनका सफर आज हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपने सपनों को पूरा करना चाहता है।

 

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Ashish Bajpai
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