जनहित के संकल्प के साथ 35 वर्षों की शासकीय सेवा: जिला पंचायत राज अधिकारी बनवारी सिंह

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जिला पंचायत राज अधिकारी इटावा, बनवारी सिंह का जन्म 05 फरवरी 1966 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के बालनपुर गाँव में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े बनवारी सिंह ने बचपन से ही अनुशासन, परिश्रम और सामुदायिक जीवन के मूल्यों को आत्मसात किया। सीमित संसाधनों के बावजूद शिक्षा के प्रति उनकी लगन और आगे बढ़ने की इच्छा ने उनके व्यक्तित्व को दृढ़ आधार प्रदान किया।

बनवारी सिंह अपनी बेहतरीन कार्यशैली और संतुलित प्रशासनिक दृष्टिकोण के लिए एक सक्षम और कर्मठ अधिकारी के रूप में पहचाने जाते हैं। वे निर्णय लेने में स्पष्टता, कार्य में पारदर्शिता और अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ समन्वय की भावना को प्राथमिकता देते हैं। समयबद्ध कार्य निष्पादन, नियमों का पालन और जनहित को सर्वोपरि रखने की उनकी कार्यपद्धति ने उन्हें एक अनुशासित एवं विश्वसनीय अधिकारी की पहचान दिलाई है। विभागीय कार्यों में उनकी सजगता, संवादशीलता और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें कई लोग एक आदर्श प्रशासनिक अधिकारी के रूप में देखते हैं।

उनके पिता स्वर्गीय करन सिंह एक सरकारी सेवक थे और अपनी ईमानदार कार्यशैली तथा कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते थे। पिता के सरकारी जीवन ने बनवारी सिंह को प्रशासनिक व्यवस्था की बारीकियों से प्रारंभिक परिचय कराया। घर में सरकारी सेवा से जुड़ी जिम्मेदारी और मर्यादा का वातावरण था, जिसने उनमें अनुशासित सोच विकसित की।

बनवारी सिंह के पिता का देहांत उनके सरकारी सेवाकाल के दौरान ही हो गया, जिससे परिवार पर अचानक जिम्मेदारियों का बोझ आ पड़ा। उस समय वे स्वयं भी स्थायी रोजगार की स्थिति में नहीं थे, फिर भी बड़े भाई होने का कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने अपने छोटे भाई विजय पाल सिंह को सरकारी सेवा में आने के लिए अपनी सहर्ष सहमति प्रदान की। यह निर्णय उनके त्याग, पारिवारिक जिम्मेदारी और दूरदर्शिता को दर्शाता है।

उनकी माता किशन प्यारी उनके जीवन की प्रेरक शक्ति रहीं। वे माता के विशेष स्नेही रहे और उन्होंने केवल प्राथमिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, नैतिकता, समाज के प्रति संवेदनशीलता और ईमानदार आचरण का पाठ भी पढ़ाया। माता द्वारा दिए गए ये संस्कार आगे चलकर उनके प्रशासनिक निर्णयों और जीवन मूल्यों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।

परिवार में उनके दो भाई विजय पाल और राकेश कुमार हैं। संयुक्त पारिवारिक वातावरण में आपसी सहयोग, सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव प्रमुख रहा। भाइयों के साथ पले-बढ़े बनवारी सिंह ने सामूहिक निर्णय और पारिवारिक एकजुटता का महत्व सीखा, जो बाद में उनके प्रशासनिक नेतृत्व में भी दिखाई देता है।

बनवारी सिंह के पिता का स्वर्गवास उनके सरकारी सेवाकाल के दौरान ही हो गया। उस समय परिवार पर अचानक जिम्मेदारियों का भार आ गया था। स्वयं उस दौर में रोजगार की स्थायी स्थिति न होने के बावजूद उन्होंने बड़े भाई होने का दायित्व निभाते हुए अपने छोटे भाई विजय पाल सिंह को सरकारी सेवा में आने के लिए अपनी सहमति दी।

उनकी पत्नी नीलम सिंह ग्राम प्रधान के रूप में सामाजिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। परिवार में शिक्षा और सामाजिक भागीदारी को विशेष महत्व दिया जाता है। उनकी पुत्री गर्विता सिंह और पुत्र अर्जित सिंह ने बीटेक की शिक्षा प्राप्त की है, जबकि नियति सिंह बीडीएस की डिग्रीप्राप्त की, जो परिवार की प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।

बनवारी सिंह की प्रथम नियुक्ति अगस्त 1991 में हुई। लगभग पैंतीस वर्षों की लंबी शासकीय सेवा के दौरान उन्होंने कई प्रशासनिक दायित्व निभाए और विभिन्न परिस्थितियों में कार्य करते हुए अनुभव प्राप्त किया। यह दीर्घ सेवा अवधि उनकी कार्यकुशलता, स्थायित्व और सेवा भावना का प्रमाण मानी जाती है।

अपनी सेवा यात्रा के दौरान उन्होंने अल्मोड़ा, आगरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, जालौन, मथुरा, मेरठ, बागपत, हाथरस तथा अमेठी जैसे विविध जनपदों में कार्य किया। प्रत्येक जिले की सामाजिक, भौगोलिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ भिन्न रहीं, जिनका सामना उन्होंने संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ किया।

20 नवम्बर 2021 को उन्होंने इटावा जनपद में जिला पंचायत राज अधिकारी के रूप में पदभार ग्रहण किया। इटावा में उनके कार्यकाल के दौरान ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया। उन्होंने विभागीय प्रक्रियाओं को नियमबद्ध ढंग से लागू करने की दिशा में कार्य किया।

उनके कार्यकाल में धारा-95(1) के अंतर्गत 17 ग्राम पंचायतों में अनियमितताओं की जांच की गई और आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई की गई। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार यह कार्रवाई नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत की गई, जिससे पंचायत प्रशासन में जवाबदेही की भावना मजबूत हुई।

इन जांचों के परिणामस्वरूप कुल ₹47,25,833 की धनराशि की वसूली दर्ज की गई। यह वसूली विभागीय जांच और विधिक प्रावधानों के अनुरूप की गई थी। वित्तीय अनुशासन की दिशा में इस कदम को पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के प्रयास के रूप में देखा जाता है।

इसके अतिरिक्त, उनके कार्यकाल में 22 मृतक आश्रितों को सफाई कर्मियों के पद पर नियुक्ति प्रदान की गई। ये नियुक्तियाँ शासन की नीतियों, पात्रता मानकों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की गईं। नियुक्ति संबंधी अभिलेख विभागीय रिकॉर्ड में संधारित हैं, जिससे पारदर्शिता का संकेत मिलता है।

नियुक्त सफाई कर्मियों के अनुसार प्रक्रिया स्पष्ट, व्यवस्थित और निष्पक्ष रही। कर्मचारियों ने बताया कि नियुक्ति में किसी प्रकार के बाहरी दबाव या अनियमितता का अनुभव नहीं हुआ। इस प्रक्रिया को जनपद में पारदर्शी प्रशासन का उदाहरण माना गया।

स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में भी उन्होंने सक्रिय पहल की। कूड़ा संग्रहण केंद्र, प्लास्टिक मैनेजमेंट यूनिट तथा फ़िल्टर चेम्बर की स्थापना और निगरानी जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी गई। विशेष रूप से यमुना नदी किनारे स्थित ग्राम पंचायतों में फ़िल्टर चैम्बर और सोक पिट की स्थिति की समीक्षा कर जल प्रदूषण नियंत्रण का प्रयास किया गया।

   

ब्लैक वॉटर प्रबंधन के अंतर्गत घरों के सेप्टिक टैंकों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को पाइप द्वारा सामुदायिक लीच पिट से जोड़ने की पहल की गई। ग्राम पंचायत मानिकपुर बिसू में 98 घरों में से 30 घरों को लीच पिट से जोड़ने का कार्य दर्ज है। तालाबों में ब्लैक वॉटर नियंत्रण और सफाई कार्यों पर भी ध्यान दिया गया।

विभिन्न ग्राम पंचायतों में वर्मी कम्पोस्ट पिट स्थापित कर जैविक अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया गया। बहादुरपुर घार, निवारी कलाँ, मानिकपुर बिसू, बेला और कामेत (सुनवारा) जैसी पंचायतों में वर्मी पिट संचालित किए गए। इन पहलों को स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आय सृजन के प्रयासों से जोड़ा गया। समग्र रूप से बनवारी सिंह की प्रशासनिक यात्रा जनहित, पारदर्शिता और विकासात्मक दृष्टिकोण से जुड़ी हुई दिखाई देती है।

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Ashish Bajpai
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