इटावा में तहसील पर तिरंगा और जवाब में गोली के शि‍कार बने छह लोग

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इतिहास की कुछ तारीखें केवल बीते समय की याद नहीं होतीं, वे आज भी दिलों को झकझोर देती हैं। ऐसी ही एक तारीख पर भर्थना के विद्यार्थियों ने जब जुलूस निकाला, तो वह केवल एक प्रदर्शन नहीं था, वह उस पीढ़ी की पुकार थी जो अन्याय को अब और सहने को तैयार नहीं थी। नन्हीं उम्र, पर इरादे फौलाद के—हर चेहरे पर देश के लिए कुछ कर गुजरने की तड़प साफ दिखाई देती थी।

जुलूस के साथ-साथ मवेशीखाने के मवेशियों को मुक्त किया गया। यह दृश्य केवल पशुओं की आज़ादी का नहीं था, बल्कि गुलामी की मानसिकता के खिलाफ एक सशक्त प्रतीक था। तहसील पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, मानो यह घोषणा की जा रही हो कि यह धरती और इसकी व्यवस्था जनता की है। उसी उबाल में रेल के तार काट दिए गए, ताकि शोषण की रफ्तार को रोका जा सके।

उसी दिन लखना मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों ने डाकखाना जला दिया। यह आग केवल ईंट-पत्थरों को नहीं लगी थी, बल्कि उस अन्यायी शासन को लगी थी जो लोगों की आवाज़ दबाकर राज कर रहा था। युवाओं को पता था कि इसकी कीमत भारी होगी, फिर भी उनके कदम नहीं डगमगाए।

महेवा के विद्यार्थियों ने महेवा नहर की कोठी को क्षति पहुंचाई। यह चोट सत्ता के अहंकार पर थी। अछल्दा स्टेशन को जलाकर जो नुकसान हुआ, उसने पूरे क्षेत्र में हलचल मचा दी। भय और साहस आमने-सामने खड़े थे, लेकिन साहस का पलड़ा भारी होता जा रहा था।

औरैया में विद्यार्थियों और देहात की जनता ने तहसील पर झंडा लगाने की कोशिश की। यह क्षण गर्व और उम्मीद से भरा था, पर उसी क्षण पुलिस की गोलियों ने उस उम्मीद को लहूलुहान कर दिया। कल्याणचन्द्र, बाबूराम, मंगलीप्रसाद, भूरेलाल नाई (औरैया), दर्शन लाल (पीपरपुर), सुल्तान खां (भीखमपुर) अपने प्राण न्योछावर कर गए। उनकी शहादत ने धरती को नम कर दिया और आसमान को गवाह बना दिया।

घायलों की चीखें उस दिन की क्रूरता बयान कर रही थीं। वीरेन्द्र सिंह, छुन्‍नू लाल, विजय शंकर, कृष्णदत्त राय, रामाधीन सुनार, परशुराम पोरवाल, सियाराम सक्सेना, पुरखई और सोनेलाल—इन नामों की हर चोट व्यवस्था के माथे पर एक सवाल थी। उनका दर्द पूरे समाज का दर्द बन गया।

ऊमरसेंड़ा में एक कांस्टेबल के मारे जाने की खबर ने हालात और विस्फोटक कर दिए। टकरूपुर में डाक लूटी गई, अहेरीपुर का लेटरवाक्स तोड़ा गया। चारों ओर असंतोष की आग फैल चुकी थी, जिसे अब किसी एक गांव या कस्बे तक सीमित नहीं किया जा सकता था।

इसके बाद सरकार ने वह चेहरा दिखाया, जिसे इतिहास कभी माफ नहीं करता। लोगों पर मनमाने जुल्म ढाए गए। भरथना, साम्हों, अछल्दा, औरैया और अन्य गांवों पर सामूहिक जुर्माना लगाया गया। मासूम परिवारों पर सज़ा थोप दी गई, बच्चों की आंखों से नींद और बुज़ुर्गों के दिल से चैन छीन लिया गया।

जिले भर में लगभग पाँच सौ गिरफ्तारियाँ हुईं। डेढ़ सौ के करीब कांग्रेस कार्यकर्ता थे, लेकिन बाकी आम लोग थे—किसान, छात्र, मज़दूर—जिनका गुनाह सिर्फ़ इतना था कि वे अन्याय के खिलाफ खड़े थे। कई लोगों को लंबी सजाएँ सुनाई गईं, लेकिन सलाखें उनके विचारों को कैद नहीं कर सकीं।

यह पूरा घटनाक्रम हमें याद दिलाता है कि आज़ादी और न्याय कभी बिना कीमत के नहीं मिलते। विद्यार्थियों का साहस, शहीदों का बलिदान और घायलों का दर्द आज भी हमसे सवाल करता है—क्या हम उनके सपनों के भारत को सहेज पाए हैं? यह कहानी केवल अतीत नहीं, यह चेतावनी है कि जब भी अन्याय सिर उठाए, आवाज़ उठाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।

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Ashish Bajpai
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