न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त का जीवन न्याय, विधि, हिन्दी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण की ऐसी प्रेरक यात्रा है, जिसने इटावा की पहचान को व्यापक स्तर पर गौरवान्वित किया। उन्होंने अपने जीवन में जिस क्षेत्र को चुना, उसमें निष्ठा और उत्कृष्टता के साथ कार्य किया और साथ ही अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति ऐसा समर्पण दिखाया, जिसने उन्हें अपने समय के विशिष्ट व्यक्तित्वों में स्थान दिलाया।
30 सितंबर 1930 को इटावा की धरती पर एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे श्री प्रेम शंकर गुप्त का बचपन ऐसे दौर में बीता, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष से गुजर रहा था। परिवार में शिक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों को विशेष महत्व दिया जाता था। इसी वातावरण ने बचपन से ही उनके भीतर अनुशासन, अध्ययनशीलता और जीवन के प्रति गंभीर दृष्टिकोण विकसित किया। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और समाज के प्रति जिम्मेदारी समझने का आधार थी।
उनके प्रारंभिक जीवन पर उनके गुरुओं का भी गहरा प्रभाव पड़ा। श्री शिशुपाल सिंह भदौरिया और श्री वल्लभ जी से मिली प्रेरणा ने उनके भीतर स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रभाषा और भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी चेतना विकसित की। यही विचार आगे चलकर उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों में दिखाई दिए और हिन्दी के प्रति उनका समर्पण उनके व्यक्तित्व की एक प्रमुख पहचान बन गया।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इटावा के थियोसोफिकल इंटर कॉलेज और सनातन धर्म इंटर कॉलेज से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में अध्ययन किया और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में विधि के अध्ययन के साथ-साथ साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति भी उनकी रुचि बनी रही। शिक्षा के इसी व्यापक दृष्टिकोण ने उनके व्यक्तित्व को केवल एक विधिवेत्ता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें साहित्य और संस्कृति के प्रति संवेदनशील व्यक्ति के रूप में भी विकसित किया।
29 जनवरी 1951 को वकील के रूप में पंजीकरण के साथ उनके विधिक जीवन की औपचारिक शुरुआत हुई। उन्होंने इटावा में विधि व्यवसाय शुरू किया और अपनी अध्ययनशीलता, तार्किक क्षमता तथा कानून की गहरी समझ के बल पर अपनी पहचान बनाई। 4 जनवरी 1962 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नामांकित अधिवक्ता बनने के बाद उनके विधिक जीवन का दायरा और व्यापक हुआ। फौजदारी और दीवानी दोनों क्षेत्रों में उन्होंने कार्य किया और अपने अनुभव तथा विशेषज्ञता को लगातार विकसित किया।
10 अगस्त 1964 से 13 जनवरी 1971 तक उन्होंने इटावा में जिला सरकारी वकील के रूप में कार्य किया। यह उनके विधिक जीवन का महत्वपूर्ण दौर था। इस दौरान उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों में अपनी विधिक समझ और अनुभव का उपयोग किया। अपने दायित्वों के प्रति उनकी निष्ठा और कानून के प्रति उनकी गहरी समझ ने उन्हें विधिक क्षेत्र में सम्मान दिलाया।
इसके बाद 18 मार्च 1971 से 6 अगस्त 1973 तक उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उप सरकारी वकील के रूप में कार्य किया। इस दौरान राज्य सरकार से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने लखनऊ पीठ में सरकारी वकील के रूप में भी सेवाएं दीं। उच्च न्यायालय में काम करने के अनुभव ने उनके विधिक ज्ञान को और व्यापक बनाया तथा न्यायिक क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा को मजबूत किया।
1 नवंबर 1976 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया। यह उनके लंबे विधिक अनुभव, ज्ञान और विशेषज्ञता की महत्वपूर्ण मान्यता थी। वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उन्होंने गहन अध्ययन, प्रभावशाली तर्क और विधिक दृष्टिकोण के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान कायम की।
17 नवंबर 1977 को श्री प्रेम शंकर गुप्त को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया। अधिवक्ता के रूप में लंबे अनुभव के बाद न्यायपीठ पर पहुंचना उनके विधिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। न्यायाधीश के रूप में उन्होंने कानून, तर्क और न्याय के सिद्धांतों को आधार बनाया। लेकिन न्यायमूर्ति गुप्त की न्यायिक यात्रा की सबसे विशिष्ट पहचान हिन्दी भाषा के प्रति उनका असाधारण समर्पण रहा।
ऐसे समय में जब उच्च न्यायालयों की न्यायिक कार्यवाही में अंग्रेजी का व्यापक प्रभाव था, न्यायमूर्ति गुप्त ने हिन्दी में निर्णय देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। उनका विश्वास था कि न्याय केवल अदालत में सुनाया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्यायिक विचार और निर्णय की भाषा भी ऐसी होनी चाहिए जिसे आम नागरिक समझ सके। हिन्दी में निर्णय लिखना उनके लिए केवल भाषा का विषय नहीं था, बल्कि न्याय व्यवस्था को समाज के अधिक निकट लाने की सोच का हिस्सा था।
अपने न्यायिक कार्यकाल में उन्होंने लगभग 4000 निर्णय हिन्दी में दिए। यह उपलब्धि हिन्दी के प्रति उनके गहरे विश्वास और समर्पण का उल्लेखनीय उदाहरण है। उनके माध्यम से यह संदेश सामने आया कि गंभीर विधिक तर्क, न्यायिक चिंतन और जटिल कानूनी विषयों को भारतीय भाषा में भी प्रभावी और स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति गुप्त का मानना था कि विधि और न्याय की भाषा जितनी सहज और स्पष्ट होगी, आम नागरिक के लिए न्याय व्यवस्था को समझना उतना ही आसान होगा। उन्होंने हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के सहज प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया तथा जटिल कानूनी शब्दावली को सरल और जनसुलभ बनाने की दिशा में प्रयास किया। उनके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि न्याय को लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण साधन थी।
उनके जीवन में राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय चेतना का विशेष स्थान था। उनके गुरुओं श्री शिशुपाल सिंह भदौरिया और श्री वल्लभ जी ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेरित किया। यही प्रेरणा आगे चलकर उनके जीवन के महत्वपूर्ण उद्देश्यों में बदल गई। विधि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार को भी अपने जीवन का महत्वपूर्ण कार्य बनाया।
न्यायिक जीवन से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका हिन्दी के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। उन्होंने ‘इटावा हिन्दी सेवा निधि’ की स्थापना की और हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए अपना समय और श्रम समर्पित किया। उनके लिए हिन्दी सेवा केवल भाषा के प्रचार तक सीमित नहीं थी, बल्कि साहित्य, संस्कृति और समाज को जोड़ने का माध्यम भी थी।
हिन्दी और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें ‘हिन्दी गौरव’, ‘साहित्य वाचस्पति’, ‘महामना मदन मोहन मालवीय सम्मान’ और ‘तुलसी सम्मान’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए। इन सम्मानों ने हिन्दी, साहित्य और विधि के क्षेत्र में उनके योगदान को व्यापक पहचान प्रदान की।
‘निज भाषा उन्नति अहै’ का विचार उनके जीवन-दर्शन में गहराई से दिखाई देता था। उन्होंने अपनी भाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज की सांस्कृतिक चेतना और आत्मसम्मान से जोड़ा। वे न्यायाधीश होने के साथ-साथ विचारक, साहित्यप्रेमी और संस्कृति के साधक भी थे। उनके व्यक्तित्व में विधि की गंभीरता, तर्क की शक्ति और साहित्यिक संवेदनशीलता का सुंदर समन्वय दिखाई देता था।
न्यायमूर्ति गुप्त का मानना था कि कानून का ज्ञान केवल न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आम नागरिक को भी अपने अधिकारों और कानून की बुनियादी समझ होनी चाहिए। हिन्दी में सरल और स्पष्ट निर्णय लिखकर उन्होंने विधिक ज्ञान को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके निर्णय विधि के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए भी अध्ययन का विषय बने।
साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति उनका लगाव भी उनके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण विशेषता था। विधि की गंभीरता और साहित्य की संवेदनशीलता उनके व्यक्तित्व में साथ-साथ दिखाई देती थी। उन्होंने हिन्दी साहित्य और विधि के बीच संबंध को महत्व दिया और यह दृष्टिकोण विकसित किया कि दोनों ही समाज और मनुष्य को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त द्वारा स्थापित इटावा हिन्दी सेवा निधि उनके जीवन की महत्वपूर्ण संस्थागत विरासतों में से एक बनी। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा को समृद्ध करना तथा हिन्दी साहित्य और संस्कृति से जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना रहा। इस संस्था के माध्यम से साहित्यकारों और हिन्दी सेवियों को सम्मान देने की परंपरा को आगे बढ़ाया गया।
इटावा हिन्दी सेवा निधि द्वारा आयोजित सारस्वत सम्मान समारोह भी हिन्दी साहित्य और कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में विकसित हुआ। इसमें कवि, लेखक और साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्यप्रेमियों से जुड़ते हैं और साहित्यिक योगदानों को सम्मानित किया जाता है। यह आयोजन हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने तथा नई पीढ़ी को हिन्दी के प्रति प्रेरित करने का माध्यम बना।
इटावा हिन्दी सेवा निधि के माध्यम से न्यायमूर्ति गुप्त के विचारों और हिन्दी सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास जारी रहा। संस्था के संचालन में उनके परिवार और सहयोगियों की भूमिका रही। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप कुमार गुप्त न्यासी के रूप में तथा राज कुमार गुप्त संयोजक के रूप में संस्था के कार्यों में सक्रिय रहे।
न्यायमूर्ति गुप्त की दृष्टि हिन्दी को केवल भारत तक सीमित रखने की नहीं थी। वे हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान दिलाने के पक्षधर थे। विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और आयोजनों के माध्यम से हिन्दी लेखकों, कवियों और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने का प्रयास इसी व्यापक सोच का हिस्सा रहा।
न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त का जीवन एक ऐसी यात्रा है, जिसमें इटावा की मिट्टी से निकला एक बालक शिक्षा और संस्कारों के साथ आगे बढ़ता है, विधि के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाता है, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायपीठ तक पहुंचता है और फिर अपनी मातृभाषा हिन्दी की सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बना लेता है।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने अपने पद को केवल अधिकार के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे समाज के प्रति जिम्मेदारी के रूप में निभाया। न्यायपालिका में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना और लगभग 4000 निर्णय हिन्दी में देना उनके हिन्दी प्रेम का असाधारण उदाहरण है।
उनकी विरासत केवल उनके न्यायिक निर्णयों में नहीं, बल्कि उस विचार में भी जीवित है कि न्याय की भाषा समाज की भाषा से जुड़नी चाहिए और अपनी भाषा की उन्नति समाज की सांस्कृतिक उन्नति का आधार बन सकती है।
