भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इटावा भी राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। इटावा नगर के साथ जिले के प्रमुख कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में हड़ताल, जुलूस, धरना, बहिष्कार और सभाओं के माध्यम से लोगों ने अंग्रेजी शासन का विरोध किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन शहरों से निकलकर गांवों तक पहुंचा और समाज के विभिन्न वर्ग इससे जुड़ते गए।
इटावा और जिले के प्रमुख कस्बों में कई अवसरों पर पूर्ण हड़ताल रही। बाजार बंद रहे और जुलूस निकाले गए। इन्हें रोकने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया और लाठीचार्ज किए गए। दमन की इन कार्रवाइयों के बावजूद राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं और राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव बढ़ता गया।
इसी दौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू इटावा आए। उनके आगमन ने स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा किया और राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली। उनके माध्यम से देश में चल रहे व्यापक स्वतंत्रता संघर्ष का संदेश स्थानीय जनता तक पहुंचा।
नवंबर 1928 में महात्मा गांधी का इटावा आगमन जिले के स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख घटनाओं में रहा। गांधी जी को स्थानीय जनता की ओर से 8,010 रुपये की थैली भेंट की गई। इसके बाद उन्होंने औरैया, कंचौसी, बकेवर और भरथना का भी दौरा किया, जहां लोगों ने उनका स्वागत करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के लिए सहयोग राशि भेंट की। इन यात्राओं से गांधी जी का संदेश जिले के कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचा।
आंदोलन के अगले चरण में छात्रों और युवाओं की भागीदारी बढ़ी। इटावा के गवर्नमेंट इंटरमीडिएट कॉलेज में चार छात्रों के निष्कासन के विरोध में 10 अगस्त को पिकेटिंग की गई। इस कार्रवाई में कांग्रेस स्वयंसेवकों की बड़ी संख्या शामिल हुई और पुलिस ने लगभग एक हजार स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया। यह घटना जिले में छात्र और राजनीतिक सक्रियता के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है।
इसी समय शराब और विलायती कपड़ों की दुकानों पर धरने दिए गए। कचहरी और स्कूलों में भी प्रदर्शन हुए। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के समर्थन का अभियान लोगों के बीच पहुंचा। इन गतिविधियों ने स्वतंत्रता आंदोलन को राजनीतिक विरोध के साथ सामाजिक और आर्थिक जीवन से भी जोड़ दिया।
कांग्रेस ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपना संगठन मजबूत किया। गांव-गांव सभाएं आयोजित की जाती थीं, जिनमें भाषणों के साथ देशभक्ति के गीतों के माध्यम से लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जाता था। इसका असर विशेष रूप से किसान वर्ग पर पड़ा और स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव इटावा के ग्रामीण समाज में बढ़ने लगा।
आंदोलन के विस्तार के साथ गिरफ्तारियों की संख्या भी बढ़ी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार जिले के लगभग दो हजार लोग जेल गए। पूरे प्रदेश में गिरफ्तारियों के मामले में इटावा का स्थान चौथा बताया गया है। यह उस समय जिले में आंदोलन की व्यापकता का महत्वपूर्ण संकेत है।
सन् 1930 में राष्ट्रीय आंदोलन और अधिक तेज हुआ। देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रभाव के साथ इटावा में भी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ीं। लोगों के बीच स्वराज्य को लेकर विश्वास मजबूत हुआ और आंदोलन का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों तक गहरा हुआ।
इस दौर में लगान बंदी का प्रश्न विशेष महत्व रखता था। किसानों से जुड़े इस मुद्दे ने राष्ट्रीय आंदोलन को सीधे ग्रामीण जीवन से जोड़ दिया। किसान वर्ग की भागीदारी बढ़ने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन का सामाजिक आधार भी व्यापक हुआ।
इटावा में स्वतंत्रता आंदोलन का यह चरण कई स्तरों पर महत्वपूर्ण था। राष्ट्रीय नेताओं के दौरों ने राजनीतिक चेतना को दिशा दी, स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसे कस्बों और गांवों तक पहुंचाया तथा छात्रों, किसानों और आम नागरिकों की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक आधार दिया।
हड़तालों और जुलूसों से लेकर पिकेटिंग और धरनों तक, गिरफ्तारियों से लेकर ग्रामीण सभाओं तक—इटावा में स्वतंत्रता आंदोलन ने धीरे-धीरे एक जनआंदोलन का रूप लिया। इन घटनाओं ने जिले के राजनीतिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित किया और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में इटावा की भागीदारी को एक स्थायी ऐतिहासिक पहचान दी।
