जब कांग्रेस संस्थापक ए.ओ. ह्यूम महि‍ला भेष में भागे इटावा से

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ए.ओ. ह्यूम, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक और ब्रिटिश प्रशासक, का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दौर की घटनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। 17 जून 1857 को उत्तर प्रदेश के इटावा में, जब स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया, ह्यूम को अपनी जान बचाने के लिए एक ग्रामीण महिला का वेश धारण कर भागना पड़ा। उस समय वे इटावा के मजिस्ट्रेट और कलेक्टर थे। यह घटना ह्यूम के जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण क्षणों में से एक मानी जाती है, जिसने उन्हें भारतीय समाज और उसकी जटिलताओं को गहराई से समझने का अवसर दिया।

1857 के विद्रोह के दौरान, इटावा के विद्रोहियों ने ह्यूम और उनके परिवार को मारने की योजना बनाई। हालांकि, अंग्रेजों को समय रहते इस योजना की भनक लग गई। बढ़पुरा, जो इटावा के निकट एक सुरक्षित स्थान था, ह्यूम के लिए शरणस्थली बना। 17 जून 1857 को, ह्यूम ने एक देहाती महिला का वेश धारण कर गुप्त रूप से इटावा छोड़ दिया और बढ़पुरा पहुंच गए। वहां वे सात दिनों तक छिपे रहे, जबकि इटावा में विद्रोह की ज्वाला भड़क रही थी।

25 जून 1857 को ग्वालियर से ब्रिटिश रेजिमेंट इटावा पहुंची और वहां पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार स्थापित हुआ। हालांकि, यह नियंत्रण केवल नाममात्र का था। इटावा में विद्रोह की चिंगारी अभी पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। इस विद्रोह ने ब्रिटिश प्रशासन को भारतीय समाज और उसकी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए मजबूर किया।

अगस्त 1857 के अंत में, ह्यूम ने अपनी भावी शासन नीति के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रतिवेदन तैयार किया और इसे ब्रिटिश सरकार को भेजा। इस दस्तावेज़ में उन्होंने भारतीय समाज की विभिन्न जातियों और उनके मुद्दों पर गहन विचार किया। उन्होंने सुझाव दिया कि राजपूतों और अन्य युद्धप्रिय जातियों को समुचित संसाधन देकर सुखी बनाया जाए। ग्रामीण साहूकारों और अदालतों के कष्टों से उन्हें दूर रखा जाए ताकि वे सरकार के प्रति वफादार बने रहें।

ह्यूम ने गूजर, अहीर और अन्य कृषि आधारित जातियों को कृषि के माध्यम से उन्नति का अवसर देने की बात कही। उन्होंने फौजदारी अदालतों को कम खर्चीला बनाने का सुझाव दिया, ताकि ये लोग सरकार के प्रति सहयोगी बन सकें। इसके विपरीत, उन्होंने व्यापारिक और शहरी समुदायों, जैसे बनिया, कायस्थ, और महाजन पर कर लगाने की सिफारिश की। उनका मानना था कि ये समुदाय अपनी संपत्ति का उपयोग ग्रामीण समाज का शोषण करने में करते हैं और सरकार की रक्षा में कोई योगदान नहीं देते।

1857 के विद्रोह के बाद, ह्यूम ने भारतीय समाज के साथ अपने संबंधों को और मजबूत किया। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय समाज की समस्याओं का समाधान केवल सैन्य बल के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक संवेदनशील और समावेशी प्रशासन की आवश्यकता थी।

ह्यूम का यह अनुभव बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में उनके योगदान का आधार बना। उन्होंने महसूस किया कि भारतीयों को संगठित होकर अपनी समस्याओं और अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए। कांग्रेस के माध्यम से उन्होंने भारतीयों को एक मंच प्रदान किया, जहां वे अपने मुद्दों पर चर्चा कर सकें और समाधान तलाश सकें।

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Ashish Bajpai
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