गोलियां चलती रहीं, ‘वंदे मातरम्’ गूंजता रहा: इटावा के तीन अमर शहीदों की शौर्य गाथा

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31 मार्च 1931 की वह सुबह ताखा क्षेत्र के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी। नगला ढकाऊ की गलियों में खुशियों की लहर दौड़ रही थी। महिलाएं घरों के बाहर खड़ी थीं, बच्चे दौड़-दौड़कर लोगों को बुला रहे थे और बुजुर्गों की आंखों में वर्षों बाद उम्मीद की चमक दिखाई दे रही थी। कारण था स्वतंत्रता सेनानी गोपाल दास यादव का जेल से वापस लौटना। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह दिन कुछ ही घंटों बाद इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में बदल जाएगा।

गांव की कच्ची पगडंडियों पर हजारों कदम एक साथ बढ़ रहे थे। हर तरफ केवल एक ही आवाज सुनाई दे रही थी—”वंदे मातरम्”, “भारत माता की जय” और “इंकलाब जिंदाबाद”। लोगों के चेहरों पर आजादी का सपना था। आंखों में वह भारत बसता था, जहां किसी अंग्रेज अफसर के सामने सिर झुकाना न पड़े।

जुलूस के सबसे आगे तीन नौजवान सीना ताने चल रहे थे—शंकर सिंह यादव, भूपाल सिंह शाक्य और बलवंत सिंह यादव। वे केवल तीन व्यक्ति नहीं थे, बल्कि उस दौर के करोड़ों भारतीयों के साहस और स्वाभिमान की पहचान थे। उन्हें पता था कि अंग्रेजों का सामना करना आसान नहीं है, लेकिन गुलामी से बड़ी कोई मौत भी नहीं थी।

अचानक गांव में बनी अंग्रेजी चौकी से सैनिकों का एक दल वहां पहुंच गया। बंदूकों से लैस अंग्रेज सिपाहियों ने जुलूस रोक लिया। आदेश दिया गया—”नारे लगाना बंद करो।” लेकिन क्या कोई मां के सम्मान में उठी आवाज को रोक सकता था? क्या कोई उस दिल को खामोश कर सकता था जिसमें आजादी की आग जल रही हो?

लोगों के कदम रुक गए, लेकिन उनके होंठ नहीं रुके। नारे पहले से अधिक बुलंद हो गए। “भारत माता की जय” की गूंज पूरे इलाके में फैल गई। अंग्रेज अधिकारियों का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्हें एहसास हो गया कि ये लोग अब डरने वाले नहीं हैं।

उसी क्षण शंकर सिंह यादव आगे बढ़े। उन्होंने अपने साथियों की ओर देखा। उनकी आंखों में डर नहीं था, केवल दृढ़ संकल्प था। उनके बगल में भूपाल सिंह शाक्य खड़े थे और दूसरी ओर बलवंत सिंह यादव। तीनों ने एक-दूसरे को देखा मानो मौन भाषा में कह रहे हों—”आज पीछे हटे तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।”

अंग्रेज अफसर ने अंतिम चेतावनी दी। लेकिन जवाब में फिर वही स्वर गूंजा—”वंदे मातरम्!” इस बार आवाज इतनी बुलंद थी कि अंग्रेजी सत्ता की नींव तक हिल गई। तीनों क्रांतिकारी सीना तानकर सैनिकों के सामने खड़े हो गए। उन्होंने पीछे खड़ी भीड़ की तरफ देखा और मुस्कुरा दिए।

अचानक बंदूकों की नालें उनकी ओर उठ गईं। एक पल के लिए समय जैसे ठहर गया। गांव की महिलाओं ने अपने बच्चों को सीने से लगा लिया। बुजुर्गों की सांसें थम गईं। लेकिन शंकर, भूपाल और बलवंत की आवाज नहीं रुकी—”भारत माता की जय!” और फिर गोलियां चल गईं।

पहली गोली चली तो धरती कांप उठी। दूसरी गोली चली तो चीखें गूंजने लगीं। तीसरी गोली चली और तीनों वीरों के सीने लहूलुहान हो गए। लेकिन कहते हैं कि जब वे जमीन पर गिरे, तब भी उनके होंठों पर “वंदे मातरम्” था। उनका शरीर गिर गया, लेकिन उनका साहस अमर हो गया।

नगला ढकाऊ की मिट्टी उस दिन उनके रक्त से लाल हो गई थी। माताओं ने अपने बेटों को खोया, पत्नियों ने अपने सुहाग खोए, बच्चों ने अपने पिता खो दिए। पूरे क्षेत्र में मातम छा गया। लेकिन उस मातम में भी गर्व था, क्योंकि गांव के बेटों ने गुलामी के आगे घुटने टेकने के बजाय शहादत को चुना था।

कहते हैं कि शहीदों की खबर दूर-दूर तक पहुंची। हर गांव में लोग उनकी चर्चा करने लगे। उनके बलिदान ने हजारों लोगों के दिलों में आजादी की नई लौ जला दी। अंग्रेज समझ गए कि वे तीन लोगों को मार सकते हैं, लेकिन उस विचार को नहीं मार सकते जो पूरे देश में फैल चुका था।

वर्षों बाद जब देश आजाद हुआ और पंडित जवाहरलाल नेहरू नगला ढकाऊ पहुंचे, तो उन्होंने भी इन अमर बलिदानियों को नमन किया। शहीद स्मारक का निर्माण हुआ, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि इस गांव की मिट्टी में तीन ऐसे सपूत सोए हैं जिन्होंने आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

आज भी जब नगला ढकाऊ में शहीद मेला लगता है, तो ऐसा लगता है जैसे शंकर सिंह यादव, भूपाल सिंह शाक्य और बलवंत सिंह यादव की आत्माएं उसी धरती पर मौजूद हैं। हर श्रद्धांजलि, हर पुष्प और हर नारा उनके बलिदान को याद करता है।

स्वतंत्रता केवल एक शब्द नहीं है। यह उन अनगिनत बलिदानों की विरासत है, जो हमें विरासत में मिली है। जब भी तिरंगा आसमान में लहराता है, तब नगला ढकाऊ के इन तीन अमर शहीदों की कहानी हवा के साथ गूंजती है—कि कुछ लोग जीते तो सबके लिए हैं, लेकिन मरते भी पूरे देश के लिए हैं।

शंकर सिंह यादव, भूपाल सिंह शाक्य और बलवंत सिंह यादव भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शहादत भारत के इतिहास में हमेशा जीवित रहेगी। जब तक तिरंगा लहराता रहेगा, जब तक भारत माता की जय का उद्घोष होता रहेगा, तब तक इन तीनों अमर वीरों का नाम भी सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता रहेगा।

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Ashish Bajpai
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