११ वीं ई० १२ वीं शताव्दी में इटावा

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१०१८ ई० तक कन्नोज के राठौर वंशी राजा इटावा पर शासन करते रहे थे उसी समय जब महमूद गजनी भारत के बारहवें आक्रमण मैं बरन (वतमान बुनान्द्शाहर) के राजा कुलचंद्र का किला जीतकर मथुरा कोलेट हुआ जब कन्नौज गया तो मांग मैं उसने पहले मूँज (इटावा से १५ मील उत्तर) के किले पर आक्रमण किया यह किला उस समय ब्राह्मणों की एक फ़ौजी टुकड़ी के अधिकार में था इ बड़े वीर और साहसी योद्धा थे उन्होंने महमूद का तीव्र प्रतिरोध किया जिसमे बहुत से लोग मरे गए अन्त में जब उन्होंने अपना प्रयात्न निष्फल देखा तो भाग गए उअर किले पर आक्रमणकारियों ने अधिकार कर लिया

‘He then went to Munj Known as the fort of Brahmans the inhabitants of Which were independent and head strong as camels. They prepared to offer opposition like evil demons and obstinate satans and when they found they could not with stand the musalmans and that their blood would be shed they took to flight, throwing them selves down upon the apertures and the lofty and broad battlements but most of them were killed in this attempt.

(Kitab-I Yamini by J. Renolds)

     “इसके बाद सुल्तान आसई के किले की ओर बड़ा, उस समय आसई का शासक चंद्रपाल था, जो  हिंदुओं का सामंत और मुखिया था वह सदैव विजय मार्ग का अग्रणी रहा था एक समय उसने कन्नौज के राजा से भी युद्ध किया था जिसमे राजा को विवश हो अपनी मुंह की खानी पड़ी थी आसई के किले के चारो ओर दुर्भय और दुर्गम बन था जिसमे भयानक सर्पवास करते थे वह जंगल इतना अँधेरा था कि उसमे पूर्णिमा की रात्रि की चांदनी भी प्रवेश न कर सकती थी”

“ये भर या राज भर राजपूत १२ वी सदी में निचले दवा में रहा करते थे और इतने शक्तिशाली थे कि आसई जैसा सुद्रढ़ गढ़ उनके अधिकार में था ’’ इन राजभरों को सेंगरों , राठौरों और चौहान राजपूतों ने नष्ट किया और दाव से बिल्कुल निकाल दिया संयुक्तप्रान्त के पुर्वी जिलों में कुछ राजभर राजपूत पाये जाते हैं जो अपने को पश्चिमी जिलों से गया हुआ बतलाते हैं

जब चंद्रपाल , चंद्रभर ने सुल्तान के आक्रमण का समाचार सुना तो यह भयभीत हुआ और भाग गया सुल्तान की आज्ञा से उसके गढ़ गिरा दिये और उसकी रक्षक फ़ौज को मर डाला गया

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Ashish Bajpai
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