अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के फारसी अनुसंधान संस्थान द्वारा “उन्नीसवीं सदी में भारत और ईरान में फारसी भाषा और साहित्य के प्रचलित रुझान” विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के प्रो वाइस-चांसलर प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान ने की। कार्यक्रम की शुरुआत फारसी अनुसंधान केंद्र के निदेशक प्रो. मोहम्मद उस्मान ग़नी के स्वागत भाषण से हुई, जिसमें उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्य और उन्नीसवीं सदी में फारसी भाषा के दरबारी और सरकारी भाषा के रूप में उपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस काल के प्रमुख कवियों और लेखकों के योगदान की भी चर्चा की।
केंद्र की सलाहकार प्रो. आज़रमी दुख़्त सफवी ने कहा कि उन्नीसवीं सदी का फारसी साहित्य भारत में एक बौद्धिक और सांस्कृतिक क्रांति लेकर आया। इस समय लेखक और कवि विश्व स्तर पर फारसी भाषा और साहित्य के माध्यम से अपनी छवि स्थापित कर रहे थे। उन्होंने ईरान में अमीर कबीर और भारत में सर सैयद अहमद खान के योगदान का उल्लेख किया, जिन्होंने आधुनिक शिक्षा और फारसी ग्रंथों के संपादन और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. फरीदुद्दीन फरीद अस्र, कल्चरल काउंसलर (ईरान), नई दिल्ली ने कहा कि इस काल में यात्रा वृतांत और यूरोपीय साहित्य के अनुवाद सामने आए। फारसी साहित्य ने समाज की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित किया, जिसमें युद्ध-विरोधी और सामाजिक एकता पर जोर दिया गया।
कुंजी भाषण देते हुए प्रो. फरहत हसन (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि मुग़ल काल के इतिहास से जुड़े उनके शोध ने उन्हें फारसी साहित्य के अध्ययन का अवसर दिया। उन्होंने महिलाओं के साहित्यिक योगदान और उन्नीसवीं सदी की रचनाओं में उनकी भूमिका पर भी प्रकाश डाला। डॉ. क़हरमान सुलैमानी, निदेशक, फारसी अनुसंधान केंद्र, ईरान कल्चर हाउस, नई दिल्ली ने कहा कि उन्नीसवीं सदी में फारसी साहित्य ने न केवल भारत में बल्कि विश्व साहित्य में भी महत्वपूर्ण विस्तार किया। उन्होंने सरल और सुलभ लेखन के महत्व पर बल दिया, जिससे साहित्य आम जनता तक पहुँच पाया।
डॉ. इदरीस अहमद, निदेशक, ग़ालिब इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली ने कहा कि उन्नीसवीं सदी का फारसी साहित्य भारत में महत्वपूर्ण था, हालांकि ब्रिटिश शासन के तहत इसका सरकारी दर्जा समाप्त हो गया। उन्होंने कहा कि कई उर्दू कवियों, जैसे मिर्ज़ा ग़ालिब, ने फारसी साहित्य में भी योगदान दिया।
उद्घाटन सत्र में पांच पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। फैकल्टी ऑफ आर्ट्स के डीन प्रो. टी. एन. सतीसन ने भारत और ईरान के फारसी साहित्य पर प्रकाश डाला और कहा कि फारसी, भले ही विदेशी भाषा थी, परंतु वह भारत में साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही।
प्रो वाइस-चांसलर प्रो. मोहम्मद मोहसिन खान ने अपने भाषण में सेमीनार की सफलता पर बधाई दी और फारसी अनुसंधान संस्थान की महत्वता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि एएमयू का यह संस्थान दोनों देशों के भाषा, साहित्य और संस्कृति के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। संस्थान के निदेशक प्रो. मोहम्मद उस्मान ग़नी ने सभी प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया। कार्यक्रम का संचालन असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. मोहम्मद इहतिशामुद्दीन ने किया।
