दुर्लभ रैपुन्जेल सिंड्रोम से पीड़ित सबसे कम उम्र की बच्चियों में से एक का सफल आप्रेशन

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उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग ने दुर्लभ रैपुन्जेल सिंड्रोम से पीड़ित सबसे कम उम्र की बच्चियों में से एक का सफल आप्रेशन कर उसकी जान बचाई। इटावा जिले के कर्री, सैफई की तीन वर्षीय बच्ची, जिसे दुनिया में अब तक की सबसे कम उम्र की रैपुन्जेल सिंड्रोम पीड़ित बच्चों में से एक माना जा रहा है, का उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (यूपीयूएमएस), सैफई में सफल ऑपरेशन किया गया। आप्रेशन करने वाले पीडियाट्रिक सर्जन डा0 राफे रहमान और डा0 सर्वेश कुमार गुप्ता ने बताया कि इटावा जिले के कर्री, सैफई के एक तीन साल की बच्ची, जो पिछले छह महीनों से पेट दर्द की समस्या से परेशान थी और चार दिनों से लगातार हरे रंग की उल्टियाॅ कर रही थी को परिजनों ने शुरू में सामान्य परेशानी समझा। जब बच्ची की स्थिति बिगड़ने लगी तो उसे 31 जनवरी, 2025 को पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग में भर्ती कराया गया। प्रारंभिक जाॅच जिसमें अल्ट्रासाउंड (यूएसजी) और सीटी स्कैन से संदेह हुआ कि बच्ची को आंतों की गंभीर समस्या हो रही है। गंभीरता को देखते हुए लैप्रोटोमी सर्जरी करने का निर्णय लिया गया। आप्रेशन के दौरान बेहद चैकाने वाली स्थिति देखने को मिली। बच्ची की छोटी आंत (डुओडेनम और जेजुनम) में दो बड़े छेद थे। जिससे बालों का गुच्छा बाहर आ रहा था। जब पूरे पेट की जाॅच की गयी तो वह पत्थर की तरह कठोर महसूस हो रहा था। सर्जरी के दौरान दो किलोग्राम के वजनी बालों का एक विशाल गुच्छा (ट्राइकोबीजोआर) पेट से निकाला गया जो छोटी आंत तक फैला हुआ था। विभाागाध्यक्ष पीडियाट्रिक सर्जरी डाॅ राफे रहमान ने बताया कि इस स्थिति को “रैपुन्जेल सिंड्रोम” के रूप में जाना जाता है, जो अत्यंत दुर्लभ है। आमतौर पर यह 15-20 वर्ष की किशोरियों में देखा जाता है, लेकिन इतनी कम उम्र में इस बीमारी का पाया जाना चिकित्सा जगत के लिए भी आश्चर्यजनक है। चिकित्सा इतिहास की बात की जाय तो इस बीमारी का अब तक का दर्ज यह दुनिया के सबसे कम उम्र के बच्चों में से एक मामला लग रहा है।

आप्रेशन का नेतृत्व तथा सर्जरी के बाद की स्थिति।

इस सफल जटिल सर्जरी को पीडियाट्रिक सर्जन डा0 रफे रहमान और डा0 सर्वेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में किया गया। जिसमें एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व प्रोफेसर डा0 उषा शुक्ला तथा डा0 सूची ने किया, जबकि पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल की जिम्मेदारी डा0 प्रद्युम्न, डा0 गिरिजा व डा0 अक्षय ने संभाली। सर्जरी में भाग लेने वाले पीडियाट्रिक सर्जन डा0 सर्वेश कुमार गुप्ता ने बताया कि ऑपरेशन के बाद बच्ची को एक दिन के लिए वेंटिलेटर पर रखा गया। छठें दिन उसे तरल और हल्का भोजन दिया गया, जिसे उसने बिना किसी समस्या के ग्रहण किया। अब बच्ची की हालत स्थिर है और वह तेजी से स्वस्थ हो रही है।

क्या है रैपुन्जेल सिंड्रोम।

पीडियाट्रिक सर्जन डा0 रफे रहमान ने बताया कि रैपुन्जेल सिंड्रोम एक दुर्लभ मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति अपने ही बाल खाने की आदत विकसित कर लेता है। ये बाल पेट में जमा होकर गुच्छे (ट्राइकोबीजोआर) का रूप ले लेते हैं, जिससे पाचन तंत्र बाधित हो जाता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति काफी जानलेवा भी हो सकती है।विशेषज्ञ चिकित्सकों के अनुसार माता-पिता व अभिभावक की सर्तकता जरूरी।

इस सम्बन्ध में बच्ची के माता-पिता ने बताया कि उनकी बच्ची पिछले दो वर्षों से अपने ही बाल खा रही थी, लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी कम उम्र में इस बीमारी का पाया जाना बेहद असामान्य है। ऐसे मामलों से बचने के लिए माता-पिता को बेहद सतर्क रहने कि जरूरत है। यदि किसी बच्चे के बाल असामान्य रूप से कम होने लगे या वह बाल चबाते हुए देखा जाए, तो तुरन्त बिना किसी देरी के डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

इस सफल आप्रेशन पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 डा0 पीके जैन ने कहा कि यह सफल ऑपरेशन न केवल बच्ची के जीवन के लिए एक नई शुरुआत है, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज किया जायेगा। आप्रेशन में भाग लेने वाली टीम को कुलपति प्रो0 डा0 पीके जैन के अलावा प्रतिकुलपति प्रो0 डा0 रमाकान्त यादव, कुलसचिव डा0 चन्द्रवीर सिंह, संकायाध्यक्ष डा0 आदेश कुमार, चिकित्सा अधीक्षक डा0 एसपी सिंह, विभाागाध्यक्ष पीडियाट्रिक डा0 आई के शर्मा के अलावा फैकेल्टी मेम्बरस् तथा चिकित्सकों ने बधाई दी।

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