बकेवर:- लवेदी क्षेत्र के यमुना नदी किनारे बाबा हमीरपुरा महादेव मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का समापन सुदामा चरित्र एवं व्यास-विदाई प्रसंग के साथ हुआ। भागवताचार्य मनमुकुन्द जी महाराज ने व्यासपीठ से सुदामा चरित्र का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग सच्ची मित्रता तथा निष्काम भक्ति का संदेश देता है। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा उज्जैन स्थित सांदीपनि आश्रम में सहपाठी थे। दोनों के बीच अटूट प्रेम था। आश्रम में भिक्षा लाने से लेकर जंगल में लकड़ी काटने तक, दोनों साथ रहते थे। उन्होंने बताया कि आश्रम से विदा होने के बाद श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बने।
सुदामा अत्यंत साधारण जीवन जीने वाले ब्राह्मण बने। गरीबी के कारण कई बार उनके परिवार को भूखा रहना पड़ता था। पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। फटे-पुराने वस्त्रों में सुदामा को देखकर द्वारपाल भी चकित रह गए। भागवताचार्य ने बताया कि मित्र की स्थिति देखकर भगवान श्रीकृष्ण भावुक हो गए। वे स्वयं दौड़कर सुदामा को अंदर लेकर आए। उन्होंने अपने आंसुओं से सुदामा के चरण धोए। सुदामा संकोचवश अपनी पोटली छिपाए रहे। श्रीकृष्ण ने उसमें रखे रूखे चावलों को प्रेमपूर्वक ग्रहण किया।
निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने सुदामा की कुटिया को महलों में बदल दिया। उनकी दरिद्रता समाप्त कर दी। कथा में शुकदेव मुनि और राजा परीक्षित का प्रसंग भी सुनाया गया। भागवताचार्य ने कहा कि शुकदेव मुनि ने राजा परीक्षित को बताया था कि कलियुग में धर्म, सत्य और दया का ह्रास होगा। मनुष्य का मूल्य धन-दौलत से आंका जाएगा। ऐसे समय में हरि-स्मरण और नाम-कीर्तन ही मुक्ति का एकमात्र साधन रहेगा। उन्होंने बताया कि सात दिनों की कथा पूर्ण होने पर शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को अंतिम उपदेश दिया।
उन्होंने कहा कि जीवन नश्वर है। इसलिए मोह-माया त्यागकर प्रभु-भक्ति में मन लगाना चाहिए। व्यास-विदाई के समय राजा परीक्षित सहित सभी श्रोता भावुक हो उठे। इस दौरान ग्राम दाउदपुर, सब्दलपुर, टकरुपुर व इकनौर,मडैया, दिलीपनगर व लखना बकेवर नगर सहित आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने कथा का रसपान किया।
