पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शून्य से शिखर तक का सफर तय करते हुए सत्ता की ओर मजबूत कदम बढ़ा दिए हैं। जिस धरती से श्यामा प्रसाद मुखर्जी का गहरा नाता रहा, उसी बंगाल में अब भाजपा का परचम लहराता नजर आ रहा है। लंबे समय से “जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है” जैसे नारों के साथ पार्टी जिस विचारधारा को आगे बढ़ा रही थी, वह अब राजनीतिक सफलता में बदलती दिख रही है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों में भाजपा को 197 सीटों पर बढ़त मिलती नजर आ रही है, जबकि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस 91 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 294 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 148 है, जिसे भाजपा आसानी से पार करती नजर आ रही है। यह परिणाम राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दे रहे हैं।
अगर 15 साल पहले के परिदृश्य पर नजर डालें तो बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का वर्चस्व था। साल 2011 में ममता बनर्जी ने 34 वर्षों के वाम शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की थी। उस समय भाजपा की स्थिति बेहद कमजोर थी और उसे एक भी सीट नहीं मिली थी, जबकि वोट प्रतिशत मात्र 4.06% था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने आसनसोल और दार्जीलिंग सीट जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
इसके बाद 2016 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन सीटों के साथ एंट्री की और वोट शेयर 10% से ऊपर पहुंचा। 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 18 सीटें जीतकर 40% से अधिक वोट हासिल किए। 2021 विधानसभा चुनाव में भाजपा 77 सीटों तक पहुंची और मुख्य विपक्षी दल बनी। हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में सीटें घटकर 12 रह गईं, लेकिन वोट प्रतिशत लगभग स्थिर रहा।
इस उभार के पीछे कई रणनीतिक और संगठनात्मक कारण रहे हैं। भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर सेंधमारी करते हुए बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा, जिनमें शुभेंदु अधिकारी प्रमुख रहे। उन्होंने दक्षिण बंगाल में संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
भाजपा की जमीनी मजबूती में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है। संघ ने ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में दशकों तक काम करते हुए अपनी पकड़ मजबूत की। ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ और ‘एकल विद्यालय’ जैसे अभियानों के जरिए आदिवासी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाया गया।
इसके अलावा उत्तर बंगाल में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के वादे और मतुआ समुदाय के समर्थन ने भाजपा को मजबूती दी। वहीं तृणमूल कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, ऐंटी-इनकम्बेंसी और स्थानीय असंतोष ने भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया।
चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। दोनों नेताओं ने राज्य में लगातार रैलियां, रोड शो और संगठनात्मक बैठकों के जरिए कार्यकर्ताओं में जोश भरा।
कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में भाजपा का यह सफर केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक लंबी रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक आधार के मजबूत होने का परिणाम माना जा रहा है। यह बदलाव आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है
