36 साल बाद खुला श्रीनगर का रघुनाथ मंदिर, आतंक के दौर में मंदिर को तोड़ कर मूर्तियां झेलम में फेंकी गयीं थीं

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Srinagars Raghunath Temple

कभी वीरान पड़े आंगन में आज फिर से श्रद्धा के स्वर गूंज उठे। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर स्थित ऐतिहासिक श्री रघुनाथ मंदिर में 36 वर्षों बाद रामनवमी का आयोजन हुआ, जिसने न सिर्फ मंदिर परिसर बल्कि पूरे इलाके को भावनाओं और आस्था से सराबोर कर दिया। फतेहकदल में झेलम नदी के किनारे स्थित इस प्राचीन मंदिर को फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया। वर्षों से खामोश पड़े प्रांगण में जब घंटे-घड़ियाल बजे, वैदिक मंत्रों का उच्चारण हुआ और भजनों की ध्वनि गूंजी, तो माहौल मानो फिर से जीवंत हो उठा। हवन की सुगंध ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

देखा जाये तो 1990 का वह काला दौर, जब आतंकियों ने इस मंदिर को निशाना बनाया था, आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है। हमले के दौरान मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया गया, मूर्तियों को खंडित कर झेलम नदी में फेंक दिया गया था और कश्मीरी पंडितों के पलायन के साथ यह धरोहर सूनसान हो गई थी। तीन दशकों से अधिक समय तक यहां सन्नाटा पसरा रहा था। न कोई पूजा हुई न कोई उत्सव। लेकिन अब वही मंदिर फिर से श्रद्धालुओं के कदमों से गुलजार है।हम आपको बता दें कि रामनवमी के अवसर पर मंदिर में भारी संख्या में भक्त पहुंचे। लंबे इंतजार के बाद पहली बार यहां उत्सव जैसा दृश्य देखने को मिला। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भावनाओं का सैलाब साफ नजर आया। किसी के लिए यह वापसी थी, तो किसी के लिए इतिहास से जुड़ने का क्षण। एक कश्मीरी पंडित ने भावुक होकर कहा, “आज का दिन हमारे लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी विरासत की वापसी है।” एक अन्य श्रद्धालु ने इसे ईश्वरीय कृपा बताते हुए कहा, “ऐसा लगता है जैसे वर्षों बाद हमारी आस्था को फिर से घर मिल गया है।”हम आपको बता दें कि श्री रघुनाथ मंदिर कभी कश्मीर में हिंदू सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। 19वीं सदी में महाराजा गुलाब सिंह द्वारा शुरू किया गया और उनके पुत्र महाराजा रणबीर सिंह द्वारा पूर्ण कराया गया यह मंदिर, अपने विशाल परिसर, स्कूल और लाइब्रेरी के लिए भी जाना जाता था। आज, जीर्ण-शीर्ण अवस्था से निकलकर यह मंदिर फिर अपने पुराने वैभव की ओर लौट रहा है जैसे इतिहास खुद को फिर से लिख रहा हो।देखा जाये तो रघुनाथ मंदिर में रामनवमी का यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि उस विश्वास की पुनर्स्थापना है जो वर्षों तक भय और अस्थिरता के बीच दबा रहा। यह दृश्य बताता है कि समय भले ही घाव दे, लेकिन आस्था उन्हें भरने की ताकत भी रखती है। 36 साल बाद लौटी यह रौनक सिर्फ एक मंदिर की नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय की उम्मीदों की वापसी है।

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