30 जनवरी 2025: सहकारी समितियों के चुनाव में 36 साल बाद बड़ा उलटफेर हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के समर्थन से अभय सेंगर सभापति चुने गए। यह 1988 के बाद पहली बार है जब भाजपा के समर्थन वाला प्रत्याशी इस पद पर काबिज हुआ है, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
इटावा डीसीडीएफ चुनाव में कुल 14 सदस्यों ने मतदान किया, जिनमें से एक मत निरस्त कर दिया गया। इस चुनाव में अभय सेंगर को 7 वोट मिले, और उन्होंने समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज की। भाजपा के इस जीत से जहां पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है, वहीं समाजवादी पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका साबित हुआ है।
उपसभापति के चुनाव में मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया, जब भाजपा और सपा के उम्मीदवारों को समान रूप से 7-7 वोट मिले। ऐसे में लॉटरी सिस्टम के तहत निर्णय लिया गया, जिसमें भाजपा के आशुतोष शुक्ला विजयी रहे। इस प्रकार भाजपा ने एक और महत्वपूर्ण पद पर अपनी स्थिति मजबूत की।
भा.ज.पा. नेता सरिता भदौरिया ने कहा कि “योगी सरकार के तहत निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया संपन्न हुई। यह चुनाव बहुत अहम था क्योंकि अब तक सपा का सहकारी समितियों पर वर्चस्व था।” वहीं, सपा सांसद जितेंद्र ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि “प्रशासन ने सत्ता पक्ष का समर्थन किया और चुनाव में धांधली हुई। एक सदस्य को नियमों के खिलाफ नामित कर मत का अधिकार दिया गया, जिससे भाजपा की जीत सुनिश्चित हुई।”
इटावा को समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन इस जीत से भाजपा को स्थानीय राजनीति में एक बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ हुआ है। यह चुनाव 2024 लोकसभा चुनाव के बाद हुए प्रमुख चुनावों में से एक था, और इसका असर आने वाले चुनावों में भी देखा जा सकता है।
