सामाजिक कार्यकर्ता गणेश ज्ञानार्थी ने फिर कहा है कि भारत को वास्तविक आजादी दिलाने का संघर्ष, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी रखकर और अंग्रेजों के विरुद्ध तत्कालीन सुविधाभोगी नेताओं की नांक में दम करने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा दिल्ली के इंडिया गेट पर लगाये जाने के स्वागत योग्य निर्णय के बाद मोदी की घोषणाएं अमल में क्यों नही आ पा रही हैं,यह भी देखने की जरूरत है।
यह जारी एक विज्ञप्ति में उन्होंने कहा कि प्रधान मंत्री मोदी अगर पहल न करते तो नेता जी से संबन्धित फाइलें कभी राष्ट्र के सामने न आ पाती । भारत सरकार नेताजी के संघर्ष और गांव देहात तक फैले उनकी आई एन ए के ज्ञात अज्ञात लड़ाका सैनानियों ( इटावा के ग्राम विक्रमपुर निवासी कैप्टन हरपाल सिंह चौहान आदि)के सभी पहलुओं पर पर्याप्त शोध कराये और उस युग के कठिन संघर्ष पीड़ा वेदना और उस समय के कांग्रेसी साजिश को राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रमों में शामिल करे। ताकि कांग्रेसी कूड़े पर पनपे परजीवी कम्युनिष्टों के षणयन्त्रकारी इतिहास की घुटन से नई पीढ़ी आजाद हो सके,और उसे अपने पूर्वजों के साथ होने वाले अन्याय का पता चल सके।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जन्म जयन्ती वर्ष की पूर्व संध्या पर प्रसारित एक विज्ञप्ति में स्तम्भकार ज्ञानार्थी ने यह मांग दोहराते हुए कहा कि आजादी के 75 वर्षों के षणयन्त्रकारी निज़ाम का दर्दनाक पहलू यह भी है कि देश में 70-75 प्रतिशत जनता अभी भी दायें-बायें चलने का अर्थ और महत्व नहीं सीख पाई है क्यांेकि सड़क पर सारे संकेत पट अंग्रेजी में ही लिखवाये जाते रहे हैं,और अब बिना पूर्ण साक्षर हुए देश को ऑन लाइन के झमेले में नौकरशाही ने फांस दिया है जिससे रोजाना उनके साथ धोखा धडी हो रही है।
आई एन ए में कार्यरत रहे प्रातः स्मरणीय गुलजारी लाल निवासी टकपुरा के पौत्र ज्ञानार्थी ने यह भी कहा कि भारत की उन्नति के लिये तत्कालीन समय में नेता जी के विचारों का आदर यदि किया गया होता तो भारत की स्थिति 50 वर्ष पूर्व ही विकसित राष्ट्रों की बराबरी करने की बन सकती थी। मगर निहित स्वार्थों और आराम तलबी के लिये अंग्रेजों की मंशा पूरी कर विभाजन स्वीकार करने वाले नेताओं में मुख्यत नेहरू जी ने नेता जी को युद्ध अपराधी घोषित कर उन्हें जिन्दा या मुर्दा ब्रिटेन को सौंपने का वचन दिया जिसे सच्चा भारतीय कभी भुला नहीं सकता है।
नेता जी से जुड़े हजारों प्रकरणों में से एक 10 जून 1933 को लन्दन में पढ़ा गया उनका अध्यक्ष्यीय भाषण उद्घृत करते हुए ज्ञानार्थी ने लिखा ‘‘अपनी राजनैतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिये हम लोग ब्रिटिश सरकार के साथ अहिंसा पूर्ण संघर्ष कर रहे हैं किन्तु आज हमारी स्थिति उस सेना के समान है जिसने कड़े संघर्ष के दौरान अचानक दुश्मन के सम्मुख बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया है। यह समर्पण न तो राष्ट्र की मांग है और न सेना का अपने नेताओं के विरुद्ध विद्रोह ही है और न ही युद्ध दौरान सैन्यबल में कटौती के कारण, बल्कि यह विद्रोह इसलिये है कि हमारे कमाण्डर-इन-चीफ (महात्मा गांधी) लगातार उपवास रखकर थक गये है अथवा किसी विशेष कारण ने उनके निर्णय को आच्छादित कर लिया है और वह कारण उनके अलावा किसी और के लिये समझ पाना असम्भव है।” और अब तक देश जन ही चुका है कि नेहरू जी गांधी की चलने नही दे रहे थे।
ज्ञानार्थी ने लिखा कि सन् 84 से तक से अनगिनत अयोध्या यात्राओं में उन्हें आचार्य नरेन्द्र देव नगर रेलवे स्टेशन के पास दक्षिण में देवकाली मंदिर में कई बार जिज्ञासा वश जाने का अवसर मिला, जहां कथित रूप से नेता जी एक साधू वेश में रहते थे। कुछ समय तक मंदिर के मंहत रहे सुभाष चन्द्र चतुर्वेदी ने वहीं वेनीगंज में नेता जी सुभाष चंद्र बोस के नाम से स्कूल भी चलाया जहां गरीब बच्चे पढ़ते थे। साधुवेश में नेता जी कभी-कभी कुछ कहते थे। नेता जी के सपनों का भारत बनाने वालों को उनका अध्ययन आवश्यक है तभी राष्ट्र वास्तव में स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बन सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि मोदी जी के प्रयत्नों से कुछ काम हुआ भी है पर लाल फीता शाही की आदतें त्याग न पाने के कारण नौकरशाही की फाइलों में उलझ कर रह गया है,जिससे नई पीढ़ी को लाभ नही मिल पा रहा है, इस पर सख्ती से ध्यान दिया जाना चाहिए।
गणेश ज्ञानार्थी (स्वतंत्र पत्रकार) 9319732637 9027595709
