किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि उस लंबी यात्रा से होती है जिसमें संघर्ष, अनुभव, निरंतरता और समाज के प्रति जिम्मेदारी साथ-साथ चलती है। पत्रकारिता जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में पांच दशक से अधिक समय तक सक्रिय रहना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। वेदव्रत गुप्ता का जीवन इसी निरंतर संघर्ष, लेखन, पत्रकारिता, संस्कृति और सामाजिक सरोकार की प्रेरक यात्रा है।

वेदव्रत गुप्ता का जन्म 7 अक्टूबर 1955 को जसवंतनगर में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री देव व्रत जी गुप्ता आर्य थे और जन्मदात्री माता स्वर्गीया ओमबती गुप्ता थीं। दुर्भाग्यवश मात्र नौ वर्ष की उम्र में उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनका लालन-पालन उनकी दूसरी माता स्वर्गीया ज्ञानवती गुप्ता ने किया। बचपन में आए इस पारिवारिक संकट ने उनके व्यक्तित्व को भीतर से मजबूत किया और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने का साहस दिया।

विज्ञान विषय में उनकी विशेष रुचि रही। उन्होंने जंतु विज्ञान में एम.एससी. तथा कीट विज्ञान में एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की। उच्च शिक्षा के बाद उनके जीवन ने जिस दिशा में कदम बढ़ाया, उसने आगे चलकर उन्हें पत्रकारिता की ऐसी दुनिया में पहुंचाया, जहां उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

वर्ष 1977 में उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान और अन्य विषयों पर लेखन शुरू किया। उनकी लेखनी को व्यापक मंच मिला और उनके लेख देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 400 से अधिक बार प्रकाशित हुए। लेखन का यही शुरुआती अनुभव आगे चलकर उनकी पत्रकारिता की मजबूत नींव बना।

वर्ष 1978 में उन्होंने इटावा के दैनिक देशधर्म से जसवंतनगर क्षेत्र में पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत की। अगले वर्ष 1979 में वे दैनिक आज, कानपुर से जुड़े। वर्ष 1982 में उन्हें दैनिक आज का जिला संवाददाता बनाया गया और 1986 तक उन्होंने इस संस्थान के साथ काम किया। उस दौर में संसाधन सीमित थे, लेकिन खबर के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और क्षेत्र की गहरी समझ लगातार मजबूत होती गई।

वर्ष 1987 में वे दैनिक माधव संदेश, इटावा में सब एडिटर के पद पर कार्यरत हुए। इसी वर्ष से 1990 तक उन्होंने जनसत्ता, नई दिल्ली के जिला संवाददाता के रूप में काम किया। उनकी रिपोर्टिंग का प्रभाव इतना व्यापक था कि उनकी खबरें इंडियन एक्सप्रेस में भी अनुवादित रूप में प्रकाशित हुईं। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य किया और दैनिक देशधर्म के संपादकीय सहयोगी के रूप में स्वर्गीय देवीदयाल दुबे जी के सानिध्य में पत्रकारिता के अनुभव को और समृद्ध किया।

वर्ष 1992 में उनके पत्रकारिता जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय शुरू हुआ, जब वे दैनिक जागरण से जुड़े। वर्ष 1992 से 2015 तक लगातार 23 वर्षों तक उन्होंने जसवंतनगर और सैफई क्षेत्र के संवाददाता के रूप में काम किया। यह वह समय था जब सैफई और आसपास का क्षेत्र तेजी से राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बन रहा था। क्षेत्र की घटनाओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने में उनकी रिपोर्टिंग की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उनकी पत्रकारिता केवल रोजमर्रा की खबरों तक सीमित नहीं रही। कछपुरा कांड और नगला विशुन कांड जैसे मामलों की रिपोर्टिंग में उन्होंने तथ्य जुटाने और घटनाओं की तह तक जाने का प्रयास किया। नगला विशुन कांड विशेष रूप से उनकी पत्रकारिता का चर्चित अध्याय रहा, जिसमें एक व्यक्ति पर अपने ही परिवार के सदस्यों की हत्या कर शवों को यमुना में बहाने और घर में ताला लगाकर फरार होने का आरोप था। करीब 22 दिन बाद उनकी रिपोर्टिंग के माध्यम से इस घटना से जुड़े तथ्य सामने आए और पूरे मामले ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया।

उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार के रूप में वेदव्रत गुप्ता की पहचान आज भी कायम है। वर्ष 2016 में उन्होंने फिर दैनिक आज के साथ काम शुरू किया और सैफई तथा जसवंतनगर क्षेत्र में पत्रकारिता की अपनी सक्रियता जारी रखी। बदलते दौर के साथ उन्होंने पत्रकारिता के डिजिटल स्वरूप को भी अपनाया और जसवंतनगर टाइम्स नाम से अपना समाचार पोर्टल शुरू किया। इसके साथ ही वे कई अन्य समाचार पोर्टलों के लिए भी समाचार प्रेषण कर रहे हैं।

वेदव्रत गुप्ता के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी सांस्कृतिक सक्रियता भी है। वर्ष 1996 में उन्होंने स्वर्गीय श्री रणवीर सिंह के साथ मिलकर सैफई महोत्सव को आरंभ कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद से वे इस आयोजन से संस्थापक प्रबंधक के रूप में जुड़े रहे। सैफई महोत्सव ने आगे चलकर देशभर में अपनी पहचान बनाई और क्षेत्र की सांस्कृतिक गतिविधियों को एक बड़ा मंच मिला।

महोत्सव के दौरान कवि सम्मेलन, कुश्ती के दंगल और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के माध्यम से लोक कला, संस्कृति और हिंदी भाषा को प्रोत्साहन मिला। देश के चर्चित खिलाड़ियों और फिल्मी हस्तियों को सैफई बुलाकर इटावा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की जनता को उनसे रूबरू कराने में भी वे सक्रिय रहे। इससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को देश की प्रमुख प्रतिभाओं को करीब से देखने और जानने का अवसर मिला।

पत्रकारिता के साथ उनका जुड़ाव समाजसेवा से भी रहा। जसवंतनगर की शंकर बारात समिति, शांतिवन, केला देवी मंदिर, लायंस क्लब सहित कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं में उन्होंने अध्यक्ष अथवा पदाधिकारी के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं। इन गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से अपना जुड़ाव बनाए रखा।

स्थानीय इतिहास और संस्कृति को सुरक्षित रखने के प्रति भी उनकी विशेष रुचि रही। जसवंतनगर की डेढ़ शताब्दी से अधिक पुरानी ऐतिहासिक मैदानी रामलीला पर उन्होंने लगभग 300 पृष्ठों की पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने एक लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा को शब्दों में दर्ज करने का प्रयास किया। वर्ष 2017 में इसका विमोचन हुआ और यह उनके लेखकीय जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल हुआ।

कोरोना महामारी के कठिन दौर में भी वे सामाजिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद और गरीब लोगों की सहायता की तथा भोजन और आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने जैसे राहत कार्यों में सहयोग किया। उनके लिए समाज से जुड़ाव केवल सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जरूरत के समय लोगों के साथ खड़े होने का भी माध्यम बना।

व्यक्तिगत जीवन में उनकी पत्नी श्रीमती सीमा देवी गुप्ता उनके जीवन की महत्वपूर्ण साथी हैं। दोनों ने परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच लंबे जीवन सफर को साथ तय किया। उनकी तीन संतानें हैं—पूजा व्रत गुप्ता, दीपा व्रत गुप्ता और अनमोल गुप्ता। पूजा व्रत गुप्ता लेखन के क्षेत्र से जुड़ी हैं और ऑस्ट्रेलिया में रहती हैं, दीपा व्रत गुप्ता आगरा में निवास करती हैं, जबकि अनमोल गुप्ता नोएडा में कार्यरत हैं।

वर्ष 1977 में लेखन से शुरू हुई उनकी यात्रा आज पांच दशक से अधिक समय बाद भी जारी है। इस दौरान पत्रकारिता के माध्यम बदले, तकनीक बदली और समाचारों की दुनिया का स्वरूप पूरी तरह बदल गया, लेकिन खबर के प्रति उनका उत्साह और अपने क्षेत्र के प्रति उनका सरोकार बना रहा। प्रिंट से डिजिटल मीडिया तक का उनका सफर बदलते पत्रकारिता युग का भी साक्षी है।

वरिष्ठ पत्रकार बीरेश मिश्रा का मानना है की वेदब्रत गुप्ता सिर्फ एक पत्रकार ही नहीं है वे पत्रकारिता की पाठशाला हैं। 80 के दशक से जो पत्रकारिता उन्होंने की वह किसी तपस्या से कम नहीं थी। उनकी वह जीवटता अनुकरणीय हैं। वह एक बहुआयामी व्यक्तित्व और लेखन के धनी हैं। आज भी उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

दैनिक जागरण इटावा के ब्यूरो चीफ गौरव डुडेजा कहते है वेदव्रत गुप्ता ने कड़े संघर्षों के बाद जमीन से उठकर पत्रकारिता में अपना मुकाम बनाया है यह पूरे जनपद के पत्रकारों के लिए आदर्श है। पत्रकारिता में एक दिन में सम्मान नहीं पाया जा सकता । आज इतनी उम्र में भी उनका जज्बा कमाल का है I
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