जनपद में पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने और फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए जिलाधिकारी शुभ्रान्त कुमार शुक्ल ने संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पराली जलाने की रोकथाम के लिए आधे-अधूरे मन से नहीं, बल्कि पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ काम किया जाए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय और शासन स्तर से जारी निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए। धान की कटाई के मौसम में किसानों को जागरूक करने, गांवों में निगरानी बढ़ाने और पराली निस्तारण के वैकल्पिक उपायों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने पर विशेष जोर दिया गया।

सोमवार को कलेक्ट्रेट स्थित नवीन सभागार में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में पराली जलाने की घटनाओं की रोकथाम एवं प्रभावी पराली प्रबंधन को लेकर बैठक आयोजित की गई। बैठक में पिछले वर्षों में जिले में सामने आई पराली जलाने की घटनाओं की समीक्षा की गई और अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि धान उत्पादक क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाकर किसानों को फसल अवशेष जलाने से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक किया जाए। जिलाधिकारी ने कहा कि जिन क्षेत्रों में पूर्व में पराली जलाने की अधिक घटनाएं दर्ज हुई हैं, वहां विशेष ध्यान देते हुए किसानों के साथ सायंकालीन गोष्ठियां आयोजित की जाएं। इन गोष्ठियों के माध्यम से किसानों को पराली के उचित निस्तारण और उसके उपयोग के व्यावहारिक विकल्पों की जानकारी दी जाए।
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, जनपद में पराली जलाने की घटनाएं पिछले वर्षों में चिंता का विषय रही हैं। वर्ष 2023 में जिले में पराली जलाने की 130 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि वर्ष 2024 में इनकी संख्या 122 रही। वहीं, वर्ष 2025 में बढ़कर 164 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों को देखते हुए जिलाधिकारी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पहले से ही प्रभावी रणनीति बनाकर कार्य किया जाए। केवल औपचारिक जागरूकता अभियान चलाने के बजाय गांव-गांव तक किसानों से संवाद स्थापित किया जाए और उन्हें फसल अवशेषों के निस्तारण के उपलब्ध विकल्पों के बारे में विस्तार से बताया जाए।
जिलाधिकारी ने कहा कि पराली जलाने की रोकथाम के लिए ग्राम स्तर पर निगरानी के साथ जागरूकता और आवश्यक प्रवर्तन की कार्रवाई भी जरूरी है। सभी खंड विकास अधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों की स्थिति की नियमित समीक्षा करें और यह सुनिश्चित करें कि किसानों को फसल अवशेषों के निस्तारण के लिए उचित विकल्प उपलब्ध हों। जिन गांवों और क्षेत्रों में धान की कटाई अधिक होती है, वहां किसानों को समय रहते जागरूक किया जाए, ताकि फसल कटने के बाद अवशेषों को खेतों में जलाने की नौबत न आए। बाहर से आने वाले कंबाइन हार्वेस्टरों की जांच करने के निर्देश भी दिए गए, जिससे निर्धारित मानकों के अनुरूप धान कटाई सुनिश्चित कराई जा सके।
जिलाधिकारी शुभ्रान्त कुमार शुक्ल ने किसानों से अपील की कि धान की कटाई सुपर एसएमएस युक्त कंबाइन हार्वेस्टर से कराएं। उन्होंने कहा कि फसल अवशेषों को खेतों में जलाने के बजाय निर्धारित वैकल्पिक विधियों से उनका निस्तारण किया जाए। किसानों को बताया जाए कि पराली का उपयोग गौशालाओं में भी किया जा सकता है। इसके लिए वे अपनी पराली निकटतम गौशाला तक पहुंचा सकते हैं। इससे फसल अवशेषों का उपयोगी निस्तारण होगा और खुले में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी।
बैठक में पराली को गौशालाओं तक पहुंचाने के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं की जानकारी किसानों तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया। अधिकारियों को बताया गया कि परिवहन व्यय के लिए मनरेगा अथवा वित्त आयोग से उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार व्यवस्था किए जाने की जानकारी किसानों को दी जाए। इसके अतिरिक्त, व्यक्तिगत स्तर पर दो ट्रॉली पराली गौशाला पहुंचाने पर एक ट्रॉली खाद प्राप्त करने की उपलब्ध व्यवस्था के बारे में भी किसानों को जागरूक किया जाए। प्रशासन का उद्देश्य है कि किसान पराली को बेकार समझकर जलाने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन के रूप में अपनाएं और इससे खेती तथा गौशालाओं दोनों को लाभ मिल सके।
जिलाधिकारी ने गौशालाओं में उत्पादित होने वाले घनजीवामृत और प्राकृतिक खाद के उत्पादन को और अधिक बढ़ावा देने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि फसल अवशेषों का समुचित उपयोग होने से गौशालाओं की उपयोगिता बढ़ेगी और प्राकृतिक खाद के माध्यम से खेतों की उर्वरता सुधारने में भी मदद मिल सकती है। पराली प्रबंधन को केवल एक मौसमी समस्या के रूप में न देखते हुए इसे कृषि संसाधनों के बेहतर उपयोग से जोड़कर कार्य करने की आवश्यकता है।
उन्होंने अधिकारियों से कहा कि किसानों को यह समझाया जाए कि फसल अवशेषों को जलाने से तत्काल खेत साफ दिखाई दे सकता है, लेकिन इसके दूरगामी नुकसान मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ते हैं। इसके विपरीत, फसल अवशेषों का वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और खेती को टिकाऊ बनाने में सहायक हो सकता है। प्राकृतिक खाद के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करके रासायनिक एवं जैविक संसाधनों के संतुलित उपयोग के प्रति भी किसानों में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।
बैठक में पराली जलाने से होने वाले पर्यावरणीय और कृषि संबंधी नुकसान की विस्तृत जानकारी दी गई। बताया गया कि एक टन धान के फसल अवशेष जलाने से लगभग तीन किलोग्राम कणिका तत्व, 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 1,460 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड, 199 किलोग्राम राख तथा दो किलोग्राम सल्फर डाईऑक्साइड उत्सर्जित होती है। इन प्रदूषकों के कारण वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ सकता है।
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक है। इससे आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्याओं के साथ हृदय एवं फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में पराली जलाने की रोकथाम केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि जागरूकता कार्यक्रमों में किसानों को इन नुकसानों की जानकारी सरल भाषा में दी जाए, ताकि वे फसल अवशेषों को जलाने से बचें और वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए प्रेरित हों।
बैठक में बताया गया कि एक टन धान की पराली जलाने से मिट्टी में उपलब्ध पोटेशियम की लगभग 5.5 किलोग्राम और सल्फर की लगभग 1.2 किलोग्राम मात्रा की हानि हो सकती है। इसके साथ ही धान की फसल द्वारा अवशोषित 50 से 70 प्रतिशत सूक्ष्म पोषक तत्वों और लगभग 400 किलोग्राम कार्बन की हानि का उल्लेख किया गया। फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी की नमी, पीएच मान, जैविक पदार्थ और लाभदायक जीवाणु भी प्रभावित होते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कृषि विशेषज्ञों के माध्यम से किसानों को यह समझाने पर जोर दिया गया कि मिट्टी की सेहत बनाए रखना अच्छी पैदावार के लिए आवश्यक है। यदि फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन किया जाए तो उनके उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण, दोनों को लाभ पहुंचाने की दिशा में काम किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से किसानों को वैज्ञानिक एवं पर्यावरण अनुकूल तरीकों से फसल अवशेषों का निस्तारण करने के लिए प्रेरित करने के निर्देश दिए गए।
बैठक में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के प्रावधानों के तहत पराली जलाने पर लगाए जाने वाले जुर्माने की जानकारी भी दी गई। बैठक में बताया गया कि दो एकड़ तक के क्षेत्र में पराली जलाने पर पांच हजार रुपये, दो से पांच एकड़ तक के क्षेत्र में 15 हजार रुपये तथा पांच एकड़ से अधिक क्षेत्र में पराली जलाने पर 30 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि किसानों को नियमों और दंडात्मक प्रावधानों के बारे में भी स्पष्ट रूप से बताया जाए, ताकि वे पराली जलाने से होने वाले नुकसान और इसके कानूनी परिणामों से अवगत रहें।
जिलाधिकारी ने कहा कि पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध संसाधनों और वैकल्पिक व्यवस्थाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। ग्राम स्तर पर सतत निगरानी रखी जाए और जहां पराली जलाने की आशंका हो, वहां समय रहते किसानों से संपर्क कर उन्हें उचित निस्तारण के लिए प्रेरित किया जाए। आवश्यकता के अनुसार नियमों के तहत प्रभावी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए। प्रशासन की मंशा है कि जागरूकता, वैकल्पिक व्यवस्था और निगरानी के समन्वय से जिले में पराली जलाने की घटनाओं को रोका जा सके।
पराली न जलाने और फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से जिलाधिकारी शुभ्रान्त कुमार शुक्ल, मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार सिंह, उप कृषि निदेशक सतीश कुमार पांडेय तथा जिला कृषि अधिकारी ओंकार सिंह ने प्रचार वाहन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस पहल के माध्यम से किसानों तक पराली प्रबंधन के विकल्पों, पराली जलाने से होने वाले नुकसान और उपलब्ध सरकारी व्यवस्थाओं की जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
बैठक में मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार सिंह, उप कृषि निदेशक सतीश कुमार पांडेय, जिला विकास अधिकारी राकेश प्रसाद, जिला कृषि अधिकारी ओंकार सिंह सहित अन्य संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे। जिलाधिकारी ने सभी अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में अभियान को गंभीरता से संचालित करें और किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए लगातार संवाद बनाए रखें। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभावी निगरानी, जागरूकता और फसल अवशेषों के बेहतर उपयोग के माध्यम से ही पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।
