मध्य पूर्व युद्ध के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भारत में सियासी घमासान

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नई दिल्ली। मध्य पूर्व में ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच जारी भीषण तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थता (मेडिएशन) की पेशकश ने भारत की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। संसद के एनेक्सी भवन में आयोजित सर्वदलीय बैठक के दौरान इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।

बैठक में विपक्षी दलों ने पाकिस्तान की अचानक उभरती भूमिका पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा। विपक्ष का कहना था कि जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अमेरिका और ईरान के बीच ‘बिचौलिए’ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं, तो भारत इस पूरे घटनाक्रम में “मूक दर्शक” क्यों बना हुआ है।

कांग्रेस नेता मुकुल वासनिक ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 26/11 मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि आज वही पाकिस्तान वैश्विक कूटनीति के केंद्र में नजर आ रहा है, जो भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े करता है।

विपक्ष के इन आरोपों पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि भारत अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से संचालित करता है और किसी भी देश की ‘मध्यस्थता’ की राजनीति से प्रभावित नहीं होता। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है और देश हर अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर संतुलित और रणनीतिक नजर बनाए हुए है।

जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत की वैश्विक भूमिका लगातार मजबूत हो रही है और देश कई महत्वपूर्ण मंचों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को “तथ्यों से परे” बताते हुए खारिज कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद यह मुद्दा भारतीय राजनीति में एक बड़े बहस का विषय बन गया है, जहां एक ओर विपक्ष सरकार की कूटनीतिक रणनीति पर सवाल उठा रहा है, वहीं सरकार अपने रुख को संतुलित और दूरदर्शी बता रही है।

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