जिले में मनरेगा के अंतर्गत काम की गति धीमी पड़ गई है, जिससे जॉब कार्ड धारकों को रोजगार मिलने में दिक्कतें आ रही हैं। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को उनके गांव में ही काम उपलब्ध कराना है, लेकिन बीते चार महीनों से बजट न आने के कारण मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। पहले बड़ी संख्या में लोगों को मनरेगा के तहत काम मिलता था, लेकिन अब यह संख्या काफी कम हो गई है।
बजट की कमी के कारण जिले की केवल 178 ग्राम पंचायतों में ही किसी तरह मनरेगा का काम चल रहा है। इस कारण प्रतिदिन औसतन केवल साढ़े पांच हजार मजदूरों को ही रोजगार मिल पा रहा है। जबकि पिछले साल प्रतिदिन औसतन आठ से नौ हजार मजदूरों को काम मिलता था। कोविड के समय यह संख्या 14 हजार तक पहुंच गई थी, जिससे मजदूरों को बड़ी राहत मिलती थी।
अब बजट के अभाव में न तो नए काम शुरू हो पा रहे हैं और न ही मजदूरी का भुगतान हो पा रहा है। यह स्थिति मजदूरों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है। जब काम ही नहीं होगा, तो मजदूरी भी नहीं मिलेगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।
जिले की 471 ग्राम पंचायतों में से केवल 178 ग्राम पंचायतों में ही किसी तरह से काम जारी है, जहां वर्तमान में करीब 5878 मजदूर काम कर रहे हैं। यदि जल्द ही बजट जारी नहीं किया गया, तो यह संख्या और कम हो सकती है, जिससे ग्रामीण मजदूरों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं।
मनरेगा के तहत मजदूरों को काम देने और उनके भुगतान की व्यवस्था की जाती है, लेकिन मौजूदा स्थिति में मजदूरों को न तो पर्याप्त काम मिल पा रहा है और न ही उनकी मजदूरी का भुगतान हो पा रहा है। सरकार से जल्द से जल्द बजट जारी करने की मांग की जा रही है, ताकि मजदूरों को फिर से रोजगार मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सके।
