सामाजिक कार्यकर्ता गणेश ज्ञानार्थी ने उत्तर प्रदेश विधान सभा की कार्यवाही में हिंदी की मुंहबोली बहन बेटी की तरह बृज,बुंदेली, अवधी और भोजपुरी भाषा के साथ साथ अंग्रेज़ी को भी स्थान देने को योगी सरकार का क्रांतिकारी,साहसिक और प्रशंसनीय निर्णय बताते हुए इसका खुले मन से स्वागत करने की जरूरत बताई है।
स्तंभकार ज्ञानार्थी ने कहा कि इन भाषाओं के सम्मानजनक प्रोत्साहन से लोकभाषाओं में कार्य करने वाले कवियों लेखकों साहित्यकारों की रचनाधर्मिता को बाल मिलेगा,जिसके बाद उन पर व्यापक स्तर पर शोध संभव हो सकेंगे। साथ ही अंग्रेजी का विरोध करने वाली दोहरी मानसिकता पर योगी जी के लताड़ने के अंदाज़ में दिए गए वक्तव्य को सौ फीसदी सत्य बताते हुए कहा कि डॉक्टर लोहिया ने राजकाज,प्रशासन और न्याय में अंग्रेजी हटाने का अभियान चलाया था,किंतु उनके नाम पर राजनीति करने वाले मुलायम और उनकी पारिवारिक पार्टी का प्रत्यक्ष आचरण ठीक उल्टा रहा,जिन्होंने हाई कोर्ट में बार बार मांग के बावजूद हिंदी टाइप राइटर नही दिए और न ही हिंदी आशु लिपिकों की भर्ती ही करवाई।
ज्ञानार्थी का कहना था कि जो बात अखबारों मंचों पर ढाई तीन दशकों से कही और लिखी जा रही थी,उसे विधान सभा के मंच पर कहने का साहस प्रदर्शित करके योगी जी ने इस सत्य को स्वीकार ही किया है कि सपा के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने में जुटे रहे और मुस्लिमों को उर्दू पढ़वा कर उन्हे कठमुल्लापन सीखने के लिए मजबूर करते रहे ,जिसके लिए वे बधाई के पात्र भी हैं।
ज्ञानार्थी ने कहा कि अरब देशों के हो लोग हिंदुस्तान के मुस्लिमो को अपने जैसा मुस्लिम नही मानते,जो पाकिस्तान आज 77 वर्ष बाद भी यहां से गए मुस्लिमों को मुजाहिर मानता है और उनसे खुला भेदभाव करता है, उन देशों के आतंकी संगठनों का एक सूत्री कार्यक्रम गजबा ए हिंद के लिए भारत में आतंकियों की फौज निर्मित करना था, जिसके लिए मुलायम ने त्रिभाषा सूत्र के अंतर्गत उर्दू शामिल कराई,बिना राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुमोदन के आमिल फाजिल आदि की डिग्रियों को अनैतिक और अनियमित रूप से मान्यता प्रदान कर हजारों लाखों मुस्लिम युवक युवतियों के साथ खुली धोखा धडी की, और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इन सबकी डिग्रियां बेकार और निरर्थक हो गई हैं, क्योंकि मुलायम आज़म खान आदि का उद्देश्य इन्हे कानूनी वैधता प्रदान करने का था ही नही,वरना इन्हे कानूनी मान्यता प्रदान करने के लिए वे निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते, मगर इन्होंने किसी नौकर शाह या शिक्षाविद की बात मानने के बजाए अपनी मनमानी की जिसका नतीजा आज मदरसों में पढ़े लोगों को उठाना पड़ रहा है।
उनका कहना था कि दशकों पूर्व से इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं था, कि उर्दू के नाम पर सपा की यह कवायद उन लोगों को खुश करने के लिए थी जो भारत में आतंक की नस्लें पैदा करना चाहते थे,जो केवल तभी संभव था जब बच्चों को अंग्रेजी विज्ञान आदि की शिक्षा से दूर रखा जाए।
