इमरान बेग – इटावा स्थित इस्लामिया इंटर कॉलेज, जो इस वर्ष अपनी 135वीं वर्षगांठ मना रहा है, सांप्रदायिक सद्भाव की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। यह शिक्षण संस्थान न केवल इटावा, बल्कि पूरे देश में अपनी शिक्षा प्रणाली और योगदान के लिए प्रसिद्ध है। इस कॉलेज ने देश के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन समेत कई प्रमुख हस्तियों की प्रारंभिक शिक्षा का गवाह बनने का गौरव प्राप्त किया है। आज यह संस्थान देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है।
1888 में मौलाना बसीरूदीन द्वारा स्थापित इस संस्थान की शुरुआत एक छोटे से मदरसे के रूप में हुई थी। शुरुआती दिनों में इसका उद्देश्य धार्मिक शिक्षा देना था, लेकिन समय के साथ इसने अपना दायरा बढ़ाया और आधुनिक शिक्षा का भी प्रसार किया। अब इस स्कूल में 5 शाखाएं संचालित हो रही हैं, जो विविध पाठ्यक्रमों में शिक्षा प्रदान करती हैं।

प्रधानाचार्य गुफरान अहमद ने बताया कि इस स्कूल की स्थापना एक विशेष तरह से हुई थी। उन्होंने बताया कि मौलाना बसीरूदीन ने चुटकी-चुटकी आटा इकट्ठा करके इस संस्थान की आधारशिला रखी थी। इसके बाद, रईस हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी ने संस्थान को एक बड़ी आर्थिक मदद दी थी। 30500 रुपये का दान देकर उन्होंने स्कूल के नाम के साथ अपना नाम जोड़ने की शर्त रखी, जिससे इस स्कूल को नई पहचान मिली और इस दान से संस्थान की शिक्षा प्रणाली को एक नई दिशा मिली।
इस कॉलेज से न केवल डॉ. जाकिर हुसैन जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति जुड़े हैं, बल्कि फिल्म “मुगल-ए-आज़म” के निर्माता के. आसिफ, प्रसिद्ध कवि डॉ. बसीर बद्र, और भारतीय हॉकी के कप्तान शकील अहमद जैसे दर्जनों महत्वपूर्ण लोग भी इस कॉलेज से जुड़े रहे हैं। ये हस्तियां अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के साथ-साथ इस कॉलेज के लिए गर्व का विषय हैं।
कॉलेज की सफलता और प्रतिष्ठा में हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी के दान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस दान के कारण ही कॉलेज की पहचान स्थापित हुई और इसके शैक्षिक मानक उच्च स्तर तक पहुंचे। आज यह कॉलेज न केवल इटावा, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में एक प्रतिष्ठित नाम बन चुका है, जो विद्यार्थियों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करता है।
12 दिसंबर 1888 को मदरसे के रूप में स्थापित इस कॉलेज ने पिछले 135 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अनूठी भूमिका निभाई है। यह संस्थान देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श बन चुका है, और इसके योगदान को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
