इष्टिकापुरी (इटावा) की पावन भूमि पर चल रहे 1108 कुण्डीय मृत्युंजय माँ पीतांबरा महायज्ञ के चतुर्थ दिवस पर मंगलवार को पूरे यज्ञमंडप में दिव्यता और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। तीन पालियों में हुईं आहुतियों के साथ पूरा नगर “स्वाहा” के आह्वान से गुंजायमान हो उठा। हर दिशा में वेदघोष, शंखध्वनि और हवन की पवित्र अग्नि ने वातावरण को अध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर दिया।

इष्टिकापुरी के धर्मनिष्ठ नागरिकों ने अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और समर्पण के साथ यज्ञ में भाग लेकर सनातन परंपरा की जीवंतता का परिचय दिया। पूज्य गुरुदेव रामदास महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा — “यज्ञ में दी गई हर आहुति केवल अग्नि को नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करती है। यह आयोजन धर्म और समाज के पुनर्जागरण का माध्यम है।”
उन्होंने सभी सनातनी धर्मावलंबियों से आह्वान किया कि वे इस महायज्ञ में सम्मिलित होकर आहुति दें और अपने जीवन को यज्ञमय बनाएं। गुरुदेव ने यह भी स्पष्ट किया कि इस दिव्य आयोजन में भाग लेने के लिए किसी प्रकार का शुल्क या दक्षिणा निर्धारित नहीं है। यह आयोजन समाज के सभी वर्गों के लिए पूर्णतः निःशुल्क और खुला है।
यज्ञ में भाग लेने के दिशा-निर्देश के अनुसार श्रद्धालुओं को केवल सनातनी परिधान में यज्ञशाला में प्रवेश की अनुमति है। पुरुष — धोती-कुर्ता या पारंपरिक भारतीय वस्त्र, महिलाएँ — साड़ी या अन्य भारतीय परिधान धारण करें।
यज्ञ के लिए आवश्यक घृत, समिधा और सामग्री यज्ञमंडप में ही उपलब्ध कराई जाती है, जबकि श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य अनुसार स्वेच्छा से दान दे सकते हैं।
यह महायज्ञ 16 नवम्बर तक निरंतर जारी रहेगा। 16 नवम्बर को पूर्णाहुति समारोह तथा 17 नवम्बर को भव्य भंडारा एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया जाएगा। आज का दिन इष्टिकापुरी की अध्यात्मिक चेतना का साक्षात् रूप बना, जहाँ हर आहुति के साथ एकता, श्रद्धा और धर्म की ज्योति और अधिक प्रखर होती गई।
कार्यक्रम संचालन एवं सहयोग में अजय दीक्षित, धर्मेंद्र मिश्र, अनिकेत श्रीवास्तव, प्रीति दुबे, बबली और कुक्कू राजौरिया विशेष रूप से सक्रिय रहे।
