तहसील क्षेत्र के पशु अस्पतालों में ताले लटके होने से पशुपालकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बीहड़ी इलाके के पशुपालक अपने मवेशियों के इलाज के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। सहसों और पिपरौली गढ़िया के पशु अस्पताल केवल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भरोसे संचालित हो रहे हैं, जिससे पशुपालकों को उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पा रही है।
राजपुर पशु अस्पताल में चिकित्सक की तैनाती तो है, लेकिन प्रशिक्षण में ड्यूटी होने के कारण अस्पताल में अक्सर ताला लटका रहता है। इस कारण पशुपालकों को अपने मवेशियों का इलाज पैरावेट से कराना पड़ रहा है।
सहसों गांव में सात वर्ष पूर्व सरकार द्वारा 31 लाख की लागत से पशु अस्पताल का निर्माण कराया गया था। बीहड़ी क्षेत्र में अस्पताल बनने से लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें मवेशियों के इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। अस्पताल खुलने के बाद शुरुआती दिनों में क्षेत्र के पशुपालकों को राहत भी मिली। उस दौरान पशु चिकित्सक डॉ. राहुल यहां बैठकर मवेशियों का इलाज कर रहे थे।
लेकिन, एक वर्ष पूर्व उनके स्थानांतरण के बाद से यहां किसी पशु चिकित्सक की तैनाती नहीं की गई है। लंबे समय से अस्पताल में ताला लटका होने से अब इमारत भी बदहाली का शिकार हो गई है। परिसर में विलायती बबूल और बड़ी-बड़ी घास उग आई हैं, जिससे अस्पताल की स्थिति और भी जर्जर हो गई है।
अस्पताल के बंद रहने से बीहड़ी इलाके के पशुपालकों को अपने मवेशियों के इलाज के लिए जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। इससे उन्हें न केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है बल्कि समय की भी बर्बादी हो रही है। पशुपालकों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द पशु अस्पतालों में चिकित्सकों की तैनाती की जाए, ताकि मवेशियों को उचित चिकित्सा सुविधा मिल सके और पशुपालकों को राहत मिल सके।