
श्री रामलीला महोत्सव समिति के तत्वावधान में आयोजित रामलीला का शुभारंभ गिरीश चंद्र गुप्ता ने भगवान श्रीराम की आरती उतारकर किया। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष अरविंद गुप्ता, प्रबंधक ज्ञानेन्द्र अवस्थी, महामंत्री राहुल राज वर्मा और उमेश गुप्ता ने उनका सम्मान किया। इसके बाद रामलीला के विभिन्न प्रसंगों का मंचन शुरू हुआ, जिन्हें देखने के लिए उपस्थित श्रद्धालु पूरे भक्तिभाव के साथ लीला का आनंद लेते रहे।
रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम के वनवास का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। वनगमन के क्रम में भगवान श्रीराम, माता सीता और अनुज लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचे। गंगा पार जाने के लिए जब प्रभु श्रीराम ने केवट से नाव मांगी, तो केवट ने अपनी अनूठी भक्ति और प्रेम का परिचय दिया। केवट भगवान श्रीराम को पहचानते हुए उनके चरण पखारने की इच्छा प्रकट करता है और चरण धोने के बाद ही उन्हें नाव में बैठाने की बात कहता है।
भगवान श्रीराम और केवट के बीच हुए संवाद का कलाकारों ने भावपूर्ण ढंग से मंचन किया। केवट की निश्छल श्रद्धा, समर्पण और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान राम-केवट संवाद के प्रसंग ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
केवट का चरित्र यह संदेश देता है कि भगवान के प्रति सच्ची भक्ति के लिए धन-दौलत या किसी विशेष पद की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मन में प्रेम, विश्वास और समर्पण का भाव होना चाहिए। केवट की सेवा भावना और भगवान श्रीराम का उसके प्रति स्नेह श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और विनम्रता की प्रेरणादायक मिसाल बना।
इसके बाद अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र वियोग में प्राण त्यागने के हृदयस्पर्शी प्रसंग का मंचन किया गया। भगवान श्रीराम के वनवास के बाद राजा दशरथ अपने प्रिय पुत्र से बिछड़ने का दुख सहन नहीं कर पाते हैं। राम के प्रति उनके असीम स्नेह, विवशता और वियोग की पीड़ा को कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से सजीव कर दिया।
राजा दशरथ की व्याकुलता और पुत्र के वियोग में उनके प्राण त्यागने के दृश्य ने रामलीला देख रहे श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। कई दर्शकों की आंखें नम हो गईं। इस प्रसंग ने पिता और पुत्र के बीच के अटूट स्नेह को दर्शाते हुए परिवार के प्रति प्रेम और रिश्तों के महत्व का संदेश दिया।
राजा दशरथ का चरित्र यह दर्शाता है कि भगवान श्रीराम के प्रति उनका प्रेम कितना गहरा था। राजमहल के वैभव और राजसत्ता के बावजूद पुत्र से बिछड़ने की पीड़ा उनके लिए असहनीय हो गई। कलाकारों ने इस भावनात्मक प्रसंग को जिस संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया, उससे दर्शक लीला के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गए।
रामलीला का एक अन्य प्रमुख आकर्षण भरत मिलाप का प्रसंग रहा। भगवान श्रीराम के वनवास जाने के बाद भरत अपने बड़े भाई को वापस अयोध्या लाने के लिए वन पहुंचते हैं। भरत प्रभु श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह करते हैं, लेकिन श्रीराम पिता के वचन और मर्यादा का पालन करने के अपने संकल्प पर अडिग रहते हैं।
दोनों भाइयों के बीच संवाद, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम के भावों का कलाकारों ने मार्मिक मंचन किया। भरत का अपने बड़े भाई के प्रति समर्पण और श्रीराम का धर्म तथा मर्यादा के प्रति अटल संकल्प देखकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। इस दृश्य ने दर्शकों को भाइयों के बीच त्याग, निष्ठा और पारिवारिक प्रेम की अनूठी मिसाल दिखाई।
भरत मिलाप का प्रसंग रामायण के उन प्रसंगों में शामिल है, जो रिश्तों में निस्वार्थ प्रेम और कर्तव्य की भावना को सर्वोपरि बताते हैं। भरत अपने लिए राजसुख की इच्छा नहीं रखते, बल्कि अपने बड़े भाई श्रीराम को ही अयोध्या का वास्तविक अधिकारी मानते हैं। वहीं भगवान श्रीराम अपने पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए वनवास पूरा करने का निर्णय दोहराते हैं।
इस प्रकार राम-केवट संवाद, दशरथ मरण और भरत मिलाप के प्रसंगों ने श्रीरामलीला के पांचवें दिन को भक्तिमय और भावनात्मक बना दिया। कलाकारों के अभिनय ने रामायण के आदर्शों, पारिवारिक मूल्यों, त्याग, समर्पण और मर्यादा के महत्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। श्रद्धालुओं ने प्रभु श्रीराम की लीलाओं का आनंद लेते हुए इन प्रसंगों से मिलने वाली प्रेरणा को आत्मसात किया।
