भरथना (रिपोर्ट- तनुज श्रीवास्तव, 9720063658)- इस सृष्टि के आदि देव, देवों के देव महादेव को शिवशंकर, भोलेनाथ और भूतनाथ आदि अनेक नामों से जिन्हें पुकारा जाता है। श्रावण मास के पुनीत पर्व पर भगवान भोलेनाथ के शिवालायों में भक्तों का जनसैलाब देखने को मिलता है।
सावन महीने के पावन पर्व पर ऐसी ही श्रद्धालुओं की भारी भीड भरथना क्षेत्र के ग्राम रमायन स्थित प्राचीन शिव मन्दिर में देखने को मिलती है। उक्त मन्दिर को ‘‘महामंशापूर्ण श्री गंगाधर विश्वनाथ शिव मन्दिर रमायन‘‘ के नाम से भी जाना जाता है। भरथना नगर से करीब तीन किमी0 की दूरी पर पूर्वाेत्तर दिशा में नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर झील के किनारे बसे गांव में यह प्राचीन शिव मन्दिर स्थित है। यह भव्य और विशाल मन्दिर अपने वास्तुशिल्प की दृष्टि में जनपद में ही नहीं अन्य जिलों में भी अपना विशेष महत्व रखता है। हर सोमवार को भी यहाँ अच्छी संख्या में महिला-पुरूष श्रद्धालु पूजन अर्चन करने आते हैं तथा समय-समय पर देवों के देव महादेव का दुग्धाभिषेक व जलाभिषेक का भी धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होता रहता है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धाभाव से भोले से जो कुछ माँगता है, भगवान भोलेनाथ उसके सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करते हैं।
इसी क्रम में मन्दिर की ओर से महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर भव्य मेला का आयोजन किया जाता है। श्रीमद् भागवत कथा, भजन कीर्तन, विशाल भण्डारा आदि अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम चलता रहता है। मन्दिर के निर्माण के सम्बन्ध में गांव के बुजुर्गांे ने बताया कि इस भव्य मन्दिर का निर्माण यहाँ के पूर्व जमींदार रमेश चन्द्र पाठक के पूर्वजों ने लगभग 400 वर्ष से भी अधिक पहले कराया था। ब्रिटिश काल में इस मन्दिर का वैभव पूर्ण यौवन पर था। मन्दिर चारों ओर सुव्यवस्थित लगभग 100 बीघा में स्थित था। ब्रिटिश काल के बाद शनै-शनै इस मन्दिर का वैभव उजडता चला गया। यह शिव मन्दिर कई वास्तुशिल्प शैलियों का संगम है। इसके महराबदार दरवाजे, कलात्मक खम्भे, बरामदे को अद्भुत सौन्दर्य प्रदान करते हैं।
मन्दिर के सामने पूर्व दिशा की ओर एक विशाल तालाब भी है। जो मन्दिर के सौन्दर्य को दोगुना कर देता है। दक्षिण भारतीय शैली में इसका मुख्य केन्द्रीय बुर्ज विशाल शंकु के आकार का है। जिसके शिखर पर स्वर्ण पत्र जडित कई कलश लगे हैं। जिसके ऊपर त्रिशूल लगा है। इन कलशों की ऊँचाई लगभग 80 फीट है। अपने निर्माणकाल से अब तक इसकी चमक फीकी नहीं पडी है।
इस गांव ने आज भी प्राचीन शिव मन्दिर और विशाल झील के कारण अपना आध्यात्मिक और नैसर्गिक महत्व नहीं खोया है। मन्दिर के समीप दक्षिण दिशा में एक छोटा शिव मन्दिर है, जो करीब 500 वर्ष पुराना मुस्लिम काल का निर्मित है। यहाँ भी भक्तों का आवागमन रहता है।
इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करना शुरू किया गया और धीरे-धीरे लोगों की आस्था का केन्द्र बने इस मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिए अन्य समाजसेवी भक्तगणों ने भी अपना सहयोग प्रदान करना शुरू किया। मन्दिर की जो बुर्जें गिराऊ थीं, उनकी मरम्मत करायी, खम्भों, दरवाजों का जीर्णोद्धार कराया और मन्दिर के सामने तालाब का पुनर्निर्माण कर सौन्दर्यीकरण किया। फिल्हाल सौन्दर्यीकरण का कार्य अभी अधूरा भी है। सहयोगियों ने अपने-अपने स्तर से मन्दिर को भव्यता प्रदान करने के लिए सहयोग किया।
सावन के सभी सोमवार में कांवरियां बम-बम भोले के उद्घोषों के साथ अपने आराध्य भगवान भोलेशंकर का जलाभिषेक भी करते हैं। साथ ही क्षेत्रीय महिला-पुरूष श्रद्धालु भक्तजन भी देवों के देव महादेव के दर्शन पूजन कर दुग्धाभिषेक व रोली चन्दन के श्रृंगार के साथ बेलपत्र, धतूरा, फल-फूल आदि भेंट करके सर्वकल्याण की कामना करते हैं।
