जिले की 17 लाख की आबादी के लिए सिर्फ छह प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र ही उपलब्ध हैं। योजना को शुरू हुए नौ साल हो चुके हैं, लेकिन अभी तक जिले में बहुत कम जन औषधि केंद्र खुल पाए हैं। इससे गरीब और जरूरतमंद मरीजों को सस्ती दरों पर दवाएं उपलब्ध कराने का उद्देश्य अधूरा रह गया है। इसके अलावा, अधिकतर लोग इन केंद्रों से दवाएं लेने में भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं।
जन औषधि केंद्रों पर 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। जिले में पहला जन औषधि केंद्र वर्ष 2017 में जिला अस्पताल के बाहर खुला था, लेकिन वह अब बंद हो चुका है। इसके बाद संयुक्त जिला अस्पताल परिसर में जुलाई 2018 में जन औषधि केंद्र शुरू किया गया, जो अब भी संचालित हो रहा है। इस केंद्र पर 600 से अधिक प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जन औषधि केंद्र खोलने को लेकर लोग अभी भी जागरूक नहीं हैं।
जिले की बड़ी आबादी के मुकाबले जन औषधि केंद्रों की संख्या बेहद कम है। केवल छह केंद्रों के भरोसे जिले की पूरी जनता को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा है। इस स्थिति के चलते मरीजों को मजबूरन निजी मेडिकल स्टोर्स से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। कई बार जरूरतमंद मरीजों को आर्थिक तंगी के कारण जरूरी दवाएं नहीं मिल पातीं, जिससे उनकी स्वास्थ्य समस्याएं और बढ़ जाती हैं।
योजना को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि हर प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र और कस्बों में जन औषधि केंद्र खोले जाएं। इसके अलावा, लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है ताकि अधिक से अधिक लोग सस्ती दरों पर उपलब्ध जेनेरिक दवाओं का लाभ उठा सकें। स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत है।
अगर जन औषधि केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ाई गई और जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया, तो यह योजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी। गरीबों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने की सरकार की मंशा तभी सफल होगी, जब पर्याप्त संख्या में जन औषधि केंद्र खोले जाएंगे और लोग इनका लाभ उठाने के लिए प्रेरित होंगे।
