इमरान बेग-इटावा की पावन धरती पर गंगा-जमुनी संस्कृति का एक अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है, और यह उदाहरण है हजरत नूर अली सैय्यद उर्फ जेल वाले सैय्यद बाबा की दरगाह। यह दरगाह साझा संस्कृति और आपसी भाईचारे की जीती-जागती मिसाल है, जहां धर्म और जाति की दीवारें टूट जाती हैं। यहां पर लोग चाहे किसी भी धर्म के हों, आकर बाबा की मजार पर माथा टेकते हैं और अपनी मन्नतें मांगते हैं।
इस दरगाह की विशेषता यह है कि यहां पर हर हफ्ते गुरुवार को मुस्लिमों के अलावा हिंदू धर्म के लोग भी बड़ी संख्या में आते हैं। इस दिन महिला और पुरुष अपने मन की कामनाओं को लेकर दरगाह पर पहुंचते हैं और यहां की पवित्रता में आस्था व्यक्त करते हैं। यह दृश्य हिंदू-मुस्लिम एकता का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां दोनों समुदायों के लोग आपसी प्रेम और सौहार्द्र के साथ पूजा अर्चना करते हैं।

इटावा की सांप्रदायिक सद्भावना का यह अद्भुत उदाहरण समय-समय पर देखने को मिलता है। वर्ष 1947 में जब देश विभाजन के दौरान भय और तनाव का माहौल था, तब इटावा के लोग हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल बने। इसी तरह, 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद जब पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव और दंगे फैल गए थे, इटावा में लोगों ने अपनी एकता और सद्भाव को बनाए रखते हुए उस कठिन समय में भी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक बने रहे।
हजरत नूर अली सैय्यद बाबा की मजार की उम्र 18वीं सदी की बताई जाती है। यह दरगाह उस समय बनी थी जब इटावा में रेलवे स्टेशन का अस्तित्व नहीं था। बाद में रेलवे अधिकारियों ने यहां पक्की दरगाह का निर्माण कराया और सुरक्षा की दृष्टि से चारों ओर लोहे के एंगल लगवाए। तब से लेकर आज तक यह दरगाह न केवल एक धार्मिक स्थल रही है, बल्कि क्षेत्रीय सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बन चुकी है।
दरगाह की देखरेख करने वाले सोनू बशीर ने बताया कि यहां प्रत्येक जुमेरात को हिंदू धर्म के लोग अधिक संख्या में आते हैं। उनकी आस्था और विश्वास की कोई सीमा नहीं होती, और यह दरगाह सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ऐसा स्थान बन चुकी है जहां वे अपने आस्थाओं के साथ एक साथ आते हैं। यह स्थल न केवल इटावा, बल्कि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महान धार्मिक केंद्र बन चुका है।
