झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ नोटिस दर नोटिस, लेकिन कार्रवाई का क्या हुआ? ताखा-ऊसराहार-भरथना में उठ रहे गंभीर सवाल

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इटावा में विजिलेंस द्वारा डिप्टी सीएमओ डॉ. श्रीनिवास यादव को कथित रूप से रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किए जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालों का दौर तेज हो गया है। खासकर ताखा, ऊसराहार और भरथना क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित क्लीनिकों और कथित झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों के बीच गंभीर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इन क्षेत्रों में चलाए गए निरीक्षण अभियानों के दौरान 100 से अधिक नोटिस जारी किए गए। हालांकि, इन नोटिसों के बाद स्थायी रूप से बंद हुए क्लीनिकों या किसी बड़ी दंडात्मक कार्रवाई के उदाहरण बेहद कम दिखाई देते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि निरीक्षण के दौरान अनियमितताएं पाई गई थीं तो फिर आगे की कार्रवाई का परिणाम क्या रहा?

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन कई क्लीनिकों को नोटिस जारी किए गए थे, वे आज भी सामान्य रूप से संचालित हो रहे हैं। इससे यह धारणा बन रही है कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि जांच, नोटिस और फिर मामले के ठंडे बस्ते में चले जाने का क्रम वर्षों से जारी है।

क्षेत्र में चर्चित एक मामले का हवाला देते हुए बताया जा रहा है कि सितंबर माह में एक क्लीनिक पर निरीक्षण के दौरान कथित रूप से सरकारी दवाएं बरामद हुई थीं। संबंधित संचालक को नोटिस जारी किया गया और कुछ दिनों तक प्रतिष्ठान बंद भी रहा। हालांकि बाद में वह दोबारा संचालित होने लगा। इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर विभागीय कार्रवाई की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे।

लोगों का कहना है कि यदि किसी चिकित्सा संस्थान या व्यक्ति के पास वैध अनुमति या आवश्यक योग्यता नहीं है और निरीक्षण में अनियमितता पाई जाती है, तो केवल नोटिस जारी कर मामला समाप्त क्यों हो जाता है? यदि गंभीर गड़बड़ियां सामने आती हैं तो एफआईआर, सीलिंग या अन्य कानूनी कार्रवाई कितनी बार की गई, इसका स्पष्ट विवरण सार्वजनिक नहीं है।

भरथना के चिकित्सक डॉ. जय यादव ने भी डिप्टी सीएमओ डॉ. श्रीनिवास यादव की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि नोटिसों के माध्यम से चिकित्सकों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बनाया जाता था। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन विजिलेंस की कार्रवाई के बाद इन दावों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

इस संबंध में पूर्व में झोलाछाप डॉक्टरों के मामलों की निगरानी से जुड़े डिप्टी सीएमओ डॉ. सतेंद्र यादव ने बताया कि अब उनके पास भरथना और ताखा क्षेत्र का प्रभार नहीं है। वहीं वर्तमान में संबंधित क्षेत्र का प्रभार देख रहे डॉ. अमित दीक्षित ने बताया कि उन्हें लगभग एक माह पूर्व ही जिम्मेदारी मिली है।

डॉ. दीक्षित के अनुसार, निरीक्षण के दौरान कमियां मिलने पर उन्होंने करीब एक दर्जन नोटिस जारी किए हैं। उन्होंने बताया कि नोटिस जारी होने के बाद संबंधित पक्ष को जवाब देने और कमियां दूर करने के लिए समय दिया जाता है। इसके बाद आवश्यक कार्रवाई के लिए फाइल जिलाधिकारी को भेजी जाती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके द्वारा हाल में जारी किए गए नोटिसों पर अभी तक अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकी है।

विजिलेंस की कार्रवाई के बाद अब विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों द्वारा मांग उठाई जा रही है कि पिछले तीन वर्षों में जारी किए गए सभी नोटिसों, उनकी जांच रिपोर्टों और उन पर हुई कार्रवाई का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। लोगों का मानना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि नोटिसों के बाद वास्तव में क्या कार्रवाई हुई और कहीं प्रक्रिया का दुरुपयोग तो नहीं हुआ।

विजिलेंस की हालिया कार्रवाई ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या विभाग और प्रशासन इन सवालों के जवाब देने के लिए व्यापक जांच कराते हैं या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा।

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