इटावा की राजनीति में सरिता भदौरिया का नाम भारतीय जनता पार्टी की प्रमुख नेताओं में लिया जाता है। समाजवादी पार्टी के गढ़ रहें इटावा में भाजपा से चुनाव जितना उन्हें “इटावा की आयरन लेडी” बनाता है। संगठनात्मक जिम्मेदारियों से लेकर विधानसभा चुनावों में लगातार दो जीत तक का उनका सफर संघर्ष, राजनीतिक सक्रियता और महिला नेतृत्व की कहानी है। वर्ष 2017 और 2022 में इटावा सदर से विधायक निर्वाचित होकर उन्होंने जिले की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

सरिता भदौरिया का जन्म 4 जनवरी 1963 को मैनपुरी जनपद के नैगवॉ गांव में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय जयदेव सिंह चौहान क्षेत्र प्रतिष्ठित व्यक्ति और पेशे से वैध थे। मैनपुरी की धरती से शुरू हुआ उनका जीवन सफर आगे चलकर इटावा की राजनीति से जुड़ गया। विवाह के बाद उन्होंने इटावा को अपनी कर्मभूमि बनाया और धीरे-धीरे सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने लगीं।

सरिता भदौरिया ने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। उनकी रुचि महिला उत्थान, बाल विवाह और दहेज जैसी सामाजिक समस्याओं से जुड़े विषयों में रही है। महिलाओं की शिक्षा, सम्मान और सामाजिक भागीदारी जैसे मुद्दे उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। समाज में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने से जुड़े विषय उनके राजनीतिक परिचय में भी शामिल हैं।

सरिता भदौरिया का विवाह 17 जून 1978 को अभयवीर सिंह भदौरिया से हुआ था। उनके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ सार्वजनिक जीवन में अपनी पहचान बनाना उनके जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। विवाह के बाद इटावा से उनका जुड़ाव बढ़ा और इसी क्षेत्र में उन्होंने अपनी राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया।

पति की मृत्यु सरिता भदौरिया के जीवन की एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत घटना रही। इस कठिन परिस्थिति के बावजूद उन्होंने आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई। राजनीति में कदम रखने के बाद उन्होंने संगठनात्मक कार्यों में भाग लिया और भारतीय जनता पार्टी में अपनी जगह बनाई। उनके जीवन का यह दौर निजी जीवन से निकलकर सार्वजनिक जीवन में पहचान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा।

सरिता भदौरिया ने वर्ष 1999 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर इटावा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने राजनीतिक सफर जारी रखा। शुरुआती चुनावी अनुभव ने उन्हें क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियों, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और चुनावी प्रतिस्पर्धा को समझने का अवसर दिया।

वर्ष 2000 में सरिता भदौरिया भारतीय जनता पार्टी से जुड़ीं। वर्ष 2004 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर इटावा लोकसभा सीट से दोबारा चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी जीत हासिल नहीं हुई। चुनावी असफलताओं के बावजूद संगठन के साथ उनकी सक्रियता जारी रही। उन्होंने पार्टी के भीतर काम करते हुए अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत करने के प्रयास किए।

वर्ष 2007 में सरिता भदौरिया को उत्तर प्रदेश भाजपा में सचिव की जिम्मेदारी मिली। यह उनके संगठनात्मक राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। प्रदेश स्तर पर पार्टी की गतिविधियों में भाग लेने और कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय करने का उन्हें अवसर मिला। इस जिम्मेदारी ने उनके राजनीतिक अनुभव को व्यापक बनाया और संगठन में उनकी भूमिका को आगे बढ़ाया।

वर्ष 2010 में सरिता भदौरिया को भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। इस जिम्मेदारी से उन्हें महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और महिला कार्यकर्ताओं से जुड़े मुद्दों पर काम करने का अवसर मिला। राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक भूमिका ने उनके राजनीतिक परिचय को इटावा से आगे बढ़ाया और महिला नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी पहचान को विस्तार दिया।

वर्ष 2013 में सरिता भदौरिया को उत्तर प्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। संगठन में लगातार महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचना उनके राजनीतिक सफर का अहम पड़ाव था। इन जिम्मेदारियों के दौरान उन्हें पार्टी की गतिविधियों, संगठनात्मक रणनीतियों और प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों को करीब से समझने का अवसर मिला।
सरिता भदौरिया ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान का प्रदेश स्तर पर नेतृत्व किया। इस अभियान का उद्देश्य बेटियों की शिक्षा और उनके प्रति सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है। महिला उत्थान, बाल विवाह और दहेज जैसी सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता उनके सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण विषय रहे हैं।

वर्ष 2017 सरिता भदौरिया के राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें इटावा सदर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार कुलदीप गुप्ता ‘संटू’ को पराजित कर पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। इस जीत के साथ वह इटावा सदर की विधायक बनीं और उनकी राजनीतिक पहचान जिले में और मजबूत हुई।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सरिता भदौरिया को 91,234 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी कुलदीप गुप्ता ‘संतू’ को 73,892 वोट प्राप्त हुए। इस प्रकार उन्होंने 17,342 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। लोकसभा चुनावों में पहले सफलता नहीं मिलने के बाद विधानसभा चुनाव में मिली यह जीत उनके राजनीतिक सफर की बड़ी उपलब्धि बनी।

इटावा को लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव का गृह जनपद के कारण इटावा का उत्तर प्रदेश की राजनीति में विशेष महत्व रहा है। ऐसे क्षेत्र में भाजपा के टिकट पर जीत हासिल करना सरिता भदौरिया के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस परिणाम ने इटावा में भाजपा की राजनीतिक उपस्थिति को मजबूती देने में योगदान दिया।

विधायक बनने के बाद सरिता भदौरिया की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। क्षेत्रीय समस्याओं को उठाना, विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेना और सरकारी योजनाओं से जुड़ी समस्याओं के समाधान का प्रयास करना उनके दायित्वों में शामिल हुआ। सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं आम जनता के जीवन से जुड़ी हैं। इन विषयों पर जनप्रतिनिधि की सक्रियता उसके कार्यकाल का महत्वपूर्ण पहलू होती है।

सरिता भदौरिया के राजनीतिक सफर में महिला एवं बाल विकास से जुड़े विषयों पर काम करने का पक्ष भी शामिल है। महिलाओं और बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दे समाज के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। महिला एवं बाल विकास संबंधी समिति में उनकी सदस्यता का उल्लेख भी उनके राजनीतिक परिचय में मिलता है। इन विषयों पर प्रभावी कार्य के लिए योजनाओं और जरूरतमंद लोगों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है।

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सरिता भदौरिया को फिर इटावा सदर से उम्मीदवार बनाया। इस बार उनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के सर्वेश कुमार शाक्य से हुआ। चुनावी मुकाबला करीबी रहा, लेकिन सरिता भदौरिया अपनी सीट बचाने में सफल रहीं। इस जीत के साथ वह लगातार दूसरी बार इटावा सदर की विधायक निर्वाचित हुईं।

वर्ष 2022 के चुनाव में सरिता भदौरिया को 98,150 वोट मिले, जबकि सर्वेश कुमार शाक्य को 94,166 वोट प्राप्त हुए। उन्होंने 3,984 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। वर्ष 2017 की जीत के बाद दूसरी बार विधानसभा पहुंचना उनके राजनीतिक सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। इस परिणाम ने इटावा सदर की राजनीति में उनकी भूमिका को बनाए रखा।

सरिता भदौरिया का राजनीतिक सफर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का भी एक उदाहरण है। कांग्रेस से शुरुआत, भाजपा में प्रवेश, संगठनात्मक जिम्मेदारियां और लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत उनके राजनीतिक जीवन के प्रमुख पड़ाव हैं। “इटावा की आयरन लेडी” के रूप में उनकी पहचान उनके समर्थकों के बीच चर्चा में रहती है।

