ऊसराहार। भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला, कौशल्या हितकारी… के मंगलमय स्वर गूंजते ही ऊसराहार का रामलीला परिसर भक्तिरस से सराबोर हो उठा। भगवान श्रीराम के जन्म का प्रसंग आते ही पूरा परिसर जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा और श्रद्धालु भावविभोर हो गए। बधाई गीतों के बीच आतिशबाजी चलाकर भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं को मिष्ठान वितरित किया गया। श्री रामलीला महोत्सव समिति के तत्वावधान में आयोजित रामलीला के प्रथम दिन नारद मोह से लेकर भगवान श्रीराम के जन्म तक की लीलाओं का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों के सजीव अभिनय और आकर्षक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को त्रेतायुग की घटनाओं का साक्षात अनुभव कराया।

रामलीला के शुभारंभ के साथ ही परिसर में श्रद्धालुओं की उत्सुकता देखते ही बनी। जैसे-जैसे लीला आगे बढ़ी, दर्शक धार्मिक प्रसंगों में डूबते चले गए। देवर्षि नारद की तपस्या, कामदेव पर विजय, अहंकार, भगवान विष्णु की लीला और रावण के अत्याचारों से लेकर भगवान श्रीराम के अवतरण तक के प्रसंगों को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। भगवान श्रीराम के जन्म के दृश्य ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
रामलीला के प्रथम दिन की शुरुआत देवर्षि नारद की तपस्या और कामदेव पर विजय के प्रसंग से हुई। मंचन में दिखाया गया कि देवर्षि नारद कठोर तपस्या करते हैं और कामदेव के प्रयासों के बावजूद अपनी तपस्या में सफल रहते हैं। इस सफलता के बाद उनके मन में अहंकार उत्पन्न हो जाता है और वे अपनी उपलब्धि को लेकर अभिमान करने लगते हैं।
भगवान विष्णु देवर्षि नारद के इस अहंकार को दूर करने के लिए माया रचते हैं। कलाकारों ने इस प्रसंग को संवादों और अभिनय के माध्यम से जीवंत बना दिया। लीला के माध्यम से दर्शकों को संदेश दिया गया कि आध्यात्मिक साधना और भक्ति के मार्ग पर भी अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है। मनुष्य को अपनी उपलब्धियों पर अभिमान करने के बजाय विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। अहंकार व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कर सकता है, जबकि विनम्रता और समर्पण उसे सही मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।
नारद मोह की लीला के बाद मंच पर रावण के बढ़ते अहंकार और अत्याचारों का प्रसंग प्रस्तुत किया गया। रावण अपनी शक्ति के मद में चूर होकर ऋषि-मुनियों को परेशान करने लगता है। उसके अत्याचारों के कारण धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों में बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं तथा धरती पर अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगता है।
रावण के आतंक से व्याकुल होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुंचते हैं और संसार में धर्म की स्थापना तथा अधर्म के विनाश के लिए अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं। देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विष्णु उन्हें आश्वस्त करते हैं कि वे पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे और धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे।
इस प्रसंग के मंचन ने दर्शकों को भगवान श्रीराम के अवतार की पृष्ठभूमि से परिचित कराया। कलाकारों ने रावण के अत्याचारों, देवताओं की चिंता और भगवान विष्णु के आश्वासन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। लीला के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जब-जब अधर्म बढ़ता है और धर्म संकट में पड़ता है, तब धर्म की रक्षा के लिए दैवीय शक्ति का प्राकट्य होता है।
रामलीला का सबसे भावपूर्ण और आकर्षक प्रसंग अयोध्या के राजा दशरथ के यहां भगवान श्रीराम सहित चारों भाइयों के जन्म का रहा। मंचन में राजा दशरथ द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराए जाने और इसके बाद उनके यहां चार पुत्रों के जन्म की कथा प्रस्तुत की गई।
भगवान श्रीराम के जन्म का प्रसंग आते ही रामलीला परिसर में उत्सव का माहौल बन गया। मंच से ‘भए प्रकट कृपाला, दीनदयाला, कौशल्या हितकारी’ के मंगलमय स्वर गूंजने लगे। बधाई गीतों के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के जयकारे लगाए। पूरा परिसर भक्ति और उल्लास से भर उठा।
भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव को यादगार बनाने के लिए आतिशबाजी की गई और श्रद्धालुओं के बीच मिठाई वितरित की गई। इस दौरान भक्तों में विशेष उत्साह दिखाई दिया। राम जन्म के दृश्य ने उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया और वातावरण में भक्ति की अनूठी छटा बिखर गई।
श्री रामलीला महोत्सव के प्रथम दिन रामलीला का शुभारंभ डॉ. राजाराम शाक्य ने किया। शुभारंभ के बाद श्रीहरि विष्णु की आरती की गई। आरती के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान का स्मरण कर सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की।
इस अवसर पर रामलीला समिति के संरक्षक ज्ञानेंद्र अवस्थी, अध्यक्ष अरविंद गुप्ता, महामंत्री संजीव कश्यप, उमेश गुप्ता और अनिल कौशल सहित समिति से जुड़े लोग मौजूद रहे। आयोजन के दौरान धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था देखने को मिली।
ऊसराहार में श्री रामलीला महोत्सव के प्रथम दिन आयोजित मंचन ने धार्मिक आस्था के साथ भारतीय संस्कृति और परंपरा की झलक प्रस्तुत की। रामलीला केवल धार्मिक कथा का मंचन नहीं, बल्कि समाज को नैतिक मूल्यों, मर्यादा, सत्य, त्याग और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला माध्यम भी है।
नारद मोह के प्रसंग से अहंकार त्यागने, रावण की लीला से अधर्म के परिणामों और भगवान श्रीराम के जन्म से धर्म की स्थापना का संदेश दिया गया। कलाकारों ने विभिन्न प्रसंगों को जीवंत बनाकर दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया, जिससे रामकथा के आध्यात्मिक और नैतिक संदेश प्रभावी रूप से सामने आए।
भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के साथ रामलीला परिसर में उमड़ा उत्साह और भक्तिमय वातावरण देर तक लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा। आतिशबाजी, बधाई गीतों और मिष्ठान वितरण के बीच ऊसराहार में राम जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। श्री रामलीला महोत्सव के प्रथम दिन की प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को रामकथा से जोड़ने के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति आस्था को भी अभिव्यक्त किया।
