‘वन स्टेशन वन प्रोडक्ट’ योजना से रेलवे स्टेशन बन रहे स्थानीय उत्पादों के बाजार, कारीगरों को मिल रहा नया मंच

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नई दिल्ली। भारतीय रेलवे की ‘वन स्टेशन वन प्रोडक्ट’ (ओएसओपी) पहल देशभर में तेजी से विस्तार पा रही है और अब रेलवे स्टेशन स्थानीय व क्षेत्रीय उत्पादों के सुलभ बाजार के रूप में उभर रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य रेलवे के व्यापक नेटवर्क का उपयोग करते हुए कारीगरों, किसानों और छोटे उद्यमियों को सीधे ग्राहकों से जोड़ना है।

शुरुआत में सीमित अवधि के सफल पायलट के बाद इस योजना को सुव्यवस्थित तरीके से देशभर में लागू किया गया। इसमें स्टॉल का आवंटन रोटेशनल आधार पर मामूली शुल्क पर किया जाता है, जिससे अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। रेलवे डिवीजन इस योजना को राज्य एजेंसियों, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के सहयोग से लागू कर रहे हैं।

ओएसओपी के तहत प्रदर्शित उत्पाद हर क्षेत्र की विशिष्ट पहचान को दर्शाते हैं। तेनकासी जंक्शन में गन्ने से बने हस्तनिर्मित उत्पाद स्थानीय कौशल को उजागर करते हैं, जबकि पटना रेलवे स्टेशन पर मधुबनी पेंटिंग्स के स्टॉल स्थानीय कलाकारों को अपनी कला बड़े मंच तक पहुंचाने का अवसर दे रहे हैं।

समावेशन को प्राथमिकता देते हुए यह योजना विशेष रूप से कारीगरों, बुनकरों, किसानों और महिला स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देती है। जिन लोगों की औपचारिक बाजारों तक पहुंच सीमित थी, उन्हें अब रेलवे प्लेटफॉर्म के माध्यम से व्यापक ग्राहक वर्ग मिल रहा है।

यात्रियों के लिए भी यह पहल खास अनुभव लेकर आई है। ओएसओपी स्टॉल्स पर उपलब्ध उत्पाद न केवल खरीदारी का अवसर देते हैं, बल्कि प्रत्येक राज्य की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान से भी परिचित कराते हैं। आसनसोल रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर लगे स्टॉल में हथकरघा बैग, हस्तशिल्प और कालीन यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं।

इसी तरह मूर मार्केट कॉम्प्लेक्स रेलवे स्टेशन पर सूती हथकरघा उत्पादों के साथ-साथ अत्तर (परफ्यूम) के स्टॉल पारंपरिक सुगंध और शिल्प का अनूठा अनुभव प्रदान कर रहे हैं, जिससे स्थानीय बुनकरों और कारीगरों को सीधा लाभ मिल रहा है।

वहीं बलांगीर रेलवे स्टेशन पर स्थापित खिलौना स्टॉल स्थानीय कारीगरों, विशेषकर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। यहां रंग-बिरंगे हस्तनिर्मित खिलौने न केवल यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय रचनात्मकता को भी राष्ट्रीय मंच दे रहे हैं।

लगातार यात्रियों की आवाजाही के कारण इन उत्पादों की मांग बनी रहती है, जिससे कारीगरों को स्थायी आय का अवसर मिलता है। यह पहल न केवल पारंपरिक शिल्प को संरक्षित कर रही है, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के लक्ष्य को भी मजबूती दे रही है।

दक्षिण से पूर्व और पश्चिम तक फैली यह योजना स्थानीय शिल्प कौशल को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर उद्यमिता को भी सशक्त बना रही है।

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