डॉ॰ सुनीता यादव का जन्म 21 जून 1976 को मैनपुरी जनपद के ग्राम अण्डनी, करहल में हुआ। पिता स्वर्गीय रामनारायण यादव, जो करहल के ब्लॉक प्रमुख रहे, और माता स्वर्गीय धूप श्री ने उन्हें संस्कार और सेवा की गहरी सीख दी। बचपन से ही वे संवेदनशील और जिज्ञासु रहीं, प्रकृति और पक्षियों के प्रति उनका स्नेह उसी उम्र से विकसित हुआ। यही बीज आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान “गौरैया संरक्षिका” के रूप में अंकुरित हुआ।
शिक्षा के क्षेत्र में उनकी लगन इतनी गहरी रही कि उन्होंने समाजशास्त्र में पीएचडी तक की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गई। वे वर्तमान में पूर्व माध्यमिक विद्यालय, खरदूली सैफई, इटावा में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। बच्चों को पढ़ाते हुए वे उन्हें किताबों से आगे भी सीख देती हैं कि पेड़-पौधे और पक्षी भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं और उनका सम्मान करना ही सच्ची शिक्षा है।
उनकी सफलता के पीछे उनके परिवार का भी बड़ा योगदान है। पति डॉ॰ नरेश कुमार, जो फिरोजाबाद में उप जिला पशु चिकित्सा अधिकारी हैं, हमेशा उनकी ताक़त बनकर खड़े रहे। वे सुनीता की इस अनोखी पहल को न केवल स्वीकारते हैं, बल्कि हर कदम पर सहयोग भी करते हैं। यही साझेदारी इस यात्रा को और सशक्त बनाती है।
उनकी पुत्री राजमणि सिंह कक्षा 10 की मेधावी छात्रा है, जिसने हाल ही में टेबल टेनिस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर परिवार और विद्यालय दोनों का मान बढ़ाया। वहीं बेटा उत्कर्ष प्रताप सिंह न केवल पढ़ाई में आगे है बल्कि गौरैयाओं का सच्चा मित्र भी बन गया है। बचपन से ही उसे इन नन्हीं चिड़ियों से गहरा लगाव है और वह दिल से उनका पालन-पोषण करता है। इस वर्ष उत्कर्ष ने अपने स्नेह और समर्पण से लगभग दो दर्जन नन्हीं गौरैयाओं को सुरक्षित पाला है, जिससे उसकी संवेदनशीलता और पर्यावरण प्रेम स्पष्ट झलकता है।
साल 2016 में जब उन्होंने देखा कि गौरैया विलुप्ति के कगार पर है, तो उनका दिल पिघल गया। एक समय था जब घरों की छतों, आँगनों और दीवारों पर गौरैयाएँ चहचहाती थीं। आज वही नज़ारा गायब होता जा रहा था। उस क्षण उन्होंने ठान लिया कि वे गौरैया को बचाएँगी। यह संकल्प उनके जीवन का ध्येय बन गया और यहीं से शुरू हुई एक नई यात्रा।
कुछ छोटे-छोटे घोंसलों से शुरू हुआ उनका प्रयास धीरे-धीरे विशाल स्वरूप लेता गया। उन्होंने अपने तीन मंज़िला मकान को गौरैयाओं के लिए “आशियाना” बना दिया। पहली और दूसरी मंज़िल पर सैकड़ों घोंसले लगाए गए और तीसरी मंज़िल पर एक छोटा-सा पार्क तैयार किया गया। हर दिन दाना-पानी की व्यवस्था की जाती है। सुबह का समय उनके घर में जादू जैसा लगता है—जहाँ सैकड़ों गौरैयाओं की चहचहाहट वातावरण को जीवन से भर देती है।
उनका घर अब केवल उनका नहीं रहा, बल्कि गौरैयाओं का भी है। जब वे इन नन्हीं चिड़ियों को दाना चुगते देखती हैं, तो उनकी आँखों में खुशी और आत्मसंतोष छलक आता है। वे कहती हैं—“गौरैया मेरी आत्मा की साथी है, उसकी चहचहाहट मेरे दिल की धड़कन है।” यह संवेदना उन्हें समाज में विशिष्ट और प्रेरणादायी बनाती है।
लेकिन उनका यह अभियान केवल घर तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने समाज को जोड़ने के लिए हर महीने संगोष्ठियाँ आयोजित करनी शुरू कीं। इसमें वे लोगों को घोंसले भेंट करती हैं और उनसे शपथ दिलवाती हैं कि वे भी अपने घरों में गौरैयाओं के लिए जगह बनाएंगे। उनके इन प्रयासों से न केवल गौरैयाओं की संख्या बढ़ रही है, बल्कि गाँव और शहरों में जागरूकता भी फैल रही है।
उन्होंने अपने अनुभवों और संघर्ष को शब्दों में ढाला और ‘गौरैया फिर लौट आई’ नामक 155 पृष्ठों की पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उनकी भावनाएँ, गौरैयाओं के साथ उनके रिश्ते और संरक्षण के उपाय सब कुछ दर्ज हैं। इस किताब के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखिका पुरस्कार मिला। यह किताब केवल एक पर्यावरणीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक भावनात्मक दास्तान है।
उनके प्रयासों और संवेदनशीलता ने उन्हें अनेक पुरस्कार दिलाए। पर्यावरण मित्र सम्मान, परिंदा प्रणय सम्मान, विधायक द्वारा शिक्षक सम्मान, प्रतिभा अलंकरण सम्मान, राष्ट्रीय उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, उत्तर प्रदेश पारस रत्न सम्मान, उत्कृष्ट लेखन सम्मान और “हरित शिक्षक सम्मान 2025” ये सभी उनके अथक प्रयासों की गवाही देते हैं। हर सम्मान के पीछे न केवल मेहनत, बल्कि अनगिनत गौरैयाओं की चहचहाहट गूँजती है।
डॉ॰ सुनीता यादव की रुचियाँ बहुआयामी हैं। उन्हें बागवानी, लेखन, पाक कला, भ्रमण और समाज सेवा का शौक है। लेकिन इनमें सबसे बड़ा प्रेम पर्यावरण और गौरैया संरक्षण का है। उनका मानना है कि यदि हर व्यक्ति अपने घर में एक कटोरा पानी और एक छोटा-सा घोंसला रखे तो यह धरती फिर से जीवन से भर सकती है।
इटावा में प्रतिवर्ष डॉ॰ सुनीता यादव के नेतृत्व में गौरैया दिवस, जिसे विश्व गौरैया दिवस के नाम से जाना जाता है, 20 मार्च को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर मार्च माह में एक विशाल आयोजन किया जाता है, जिसमें गौरैया से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा होती है और सैकड़ों लोग इसमें शामिल होकर पक्षी संरक्षण का संदेश आगे बढ़ाते हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रत्येक सहभागी को उपहार स्वरूप हस्तनिर्मित गौरैया का घोंसला भेंट किया जाता है। इस अभियान का सशक्त नारा है— “हर घर घोंसला, हर घर गौरैया।”
डॉ॰ सुनीता यादव का जीवन भावनाओं से भरी एक प्रेरक गाथा है। वे यह साबित करती हैं कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार या संगठनों का काम नहीं है, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है। उनकी कहानी पढ़कर हर कोई महसूस करता है कि परिवर्तन कठिन नहीं, बस नीयत मजबूत होनी चाहिए। उनका गौरैया हाउस केवल पक्षियों का नहीं, बल्कि आशा, संवेदना और समर्पण का घर है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।