डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य, संतुलन और मानवीय जुड़ाव पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

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इटावा/सैफई। डिजिटल तकनीक ने जहां लोगों के जीवन को सुविधाजनक बनाया है, वहीं इसके बढ़ते इस्तेमाल ने मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संबंधों और जीवनशैली के सामने कई नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। इन्हीं समकालीन चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय (यूपीयूएमएस), सैफई के नर्सिंग संकाय की ओर से ‘Digital Minds, Healthy Lives: Building Resilience, Balance & Human Connection in the Digital Era’ विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने, तकनीक के उपयोग में संतुलन स्थापित करने और मानवीय संबंधों को मजबूत बनाए रखने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।

सम्मेलन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय सिंह ने डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव और उसके साथ जीवन में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने डिजिटल सुविधाओं और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के बीच अंतर को समझने तथा मानसिक स्वास्थ्य और मानवीय जुड़ाव को प्राथमिकता देने के महत्व को रेखांकित किया। सम्मेलन का व्यापक उद्देश्य यह संदेश देना रहा कि तकनीक का उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए, न कि उसे इस तरह अपनाया जाए कि व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत संतुलन और सामाजिक संबंध प्रभावित होने लगें।

वर्तमान समय में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों की दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और कार्यक्षेत्र में डिजिटल माध्यमों ने अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। हालांकि, इनके अत्यधिक इस्तेमाल से तनाव, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, नींद की दिनचर्या में बदलाव और सामाजिक संपर्कों में कमी जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। सम्मेलन में डिजिटल युग की इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करने और तकनीक के साथ संतुलित जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया गया।

राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान Gen-Z Mindset यानी नई पीढ़ी की सोच और डिजिटल व्यवहार पर भी चर्चा हुई। आज की युवा पीढ़ी शिक्षा, मनोरंजन, संवाद और करियर से जुड़ी गतिविधियों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग करती है। ऐसे में युवाओं की मानसिक स्थिति, उनकी अपेक्षाओं, ऑनलाइन अनुभवों और सामाजिक व्यवहार को समझना जरूरी है। विशेषज्ञों ने सम्मेलन में नई पीढ़ी से जुड़े समकालीन विषयों पर विचार साझा करते हुए डिजिटल वातावरण में मानसिक मजबूती और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।

सम्मेलन का एक प्रमुख विषय Digital Detox रहा, जिसका आशय डिजिटल उपकरणों और ऑनलाइन गतिविधियों से समय-समय पर दूरी बनाकर अपने दैनिक जीवन में संतुलन स्थापित करना है। लगातार मोबाइल फोन या सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने से व्यक्ति की दिनचर्या प्रभावित हो सकती है। ऐसे में डिजिटल माध्यमों के उपयोग के लिए समय निर्धारित करना, परिवार के साथ समय बिताना, शारीरिक गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करना और पर्याप्त आराम करना उपयोगी आदतें हो सकती हैं। डिजिटल डिटॉक्स का उद्देश्य तकनीक से पूरी तरह दूर होना नहीं, बल्कि उसका विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना है।

कार्यक्रम में FOMO to JOMO विषय ने भी ध्यान आकर्षित किया। FOMO यानी ‘Fear of Missing Out’ का अर्थ है किसी गतिविधि, अवसर या अनुभव से पीछे छूट जाने का डर। सोशल मीडिया पर दूसरों की गतिविधियों और उपलब्धियों को लगातार देखने से कुछ लोगों में तुलना की भावना या अनावश्यक दबाव पैदा हो सकता है। इसके विपरीत JOMO यानी ‘Joy of Missing Out’ का आशय हर ऑनलाइन गतिविधि में शामिल होने की अनिवार्यता से मुक्त होकर अपने समय, पसंद और वास्तविक जीवन के अनुभवों का आनंद लेना है। इस विषय के माध्यम से डिजिटल दुनिया में संतुलित दृष्टिकोण और मानसिक सुकून के महत्व को समझने पर जोर दिया गया।

सम्मेलन में **Digital Parenting** पर भी विचार-विमर्श किया गया। डिजिटल युग में बच्चों की शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों में इंटरनेट की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अभिभावकों के सामने बच्चों को तकनीक के सुरक्षित और जिम्मेदार इस्तेमाल के लिए मार्गदर्शन देने की चुनौती है। बच्चों के स्क्रीन टाइम, ऑनलाइन सुरक्षा, डिजिटल सामग्री के चयन और परिवार के साथ संवाद जैसे पहलुओं पर जागरूकता आवश्यक है। डिजिटल पैरेंटिंग का उद्देश्य बच्चों पर केवल प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि उन्हें तकनीक का समझदारी से उपयोग करना सिखाना और उनके साथ भरोसेमंद संवाद बनाए रखना है।

इसके अलावा सम्मेलन में Burnout to Balance विषय के अंतर्गत लगातार काम, डिजिटल उपलब्धता और मानसिक थकान के बीच संतुलन स्थापित करने पर चर्चा की गई। डिजिटल माध्यमों के कारण कई बार व्यक्ति कार्य और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमा नहीं बना पाता। लगातार संदेशों, सूचनाओं और काम से जुड़े ऑनलाइन संपर्कों के बीच आराम तथा व्यक्तिगत समय प्रभावित हो सकता है। ऐसे में काम और विश्राम के लिए उचित समय निर्धारित करना, तनाव के संकेतों को पहचानना और मानसिक स्वास्थ्य को महत्व देना जरूरी है।

Digital Well-being भी सम्मेलन का महत्वपूर्ण विषय रहा। इसका उद्देश्य तकनीक के उपयोग को इस प्रकार व्यवस्थित करना है कि व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। डिजिटल वेल-बीइंग के अंतर्गत स्क्रीन टाइम के प्रति जागरूकता, ऑनलाइन व्यवहार में संतुलन, वास्तविक सामाजिक संबंधों को समय देना और डिजिटल गतिविधियों के प्रभावों को समझना शामिल है। सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा के माध्यम से तकनीक और मानवीय जीवन के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करने का संदेश दिया गया।

उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई के नर्सिंग संकाय की ओर से आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन ने डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराया। चिकित्सा एवं नर्सिंग शिक्षा के क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और जीवनशैली से संबंधित विषयों पर चर्चा का विशेष महत्व है, क्योंकि स्वास्थ्य की अवधारणा केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक और सामाजिक कल्याण भी शामिल है।

सम्मेलन का मूल संदेश रहा कि आधुनिक तकनीक से दूरी बनाने के बजाय उसके उपयोग में संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। डिजिटल सुविधाओं का लाभ उठाते हुए मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक संबंधों और मानवीय संवेदनाओं को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) अजय सिंह के विचारों और सम्मेलन में उठाए गए समकालीन विषयों के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि स्वस्थ डिजिटल जीवनशैली के लिए तकनीकी प्रगति के साथ मानसिक मजबूती, संतुलन और मानवीय जुड़ाव को बनाए रखना भी जरूरी है।

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