नई दिल्ली। देश की महत्वाकांक्षी गहरे समुद्र मिशन के तहत ‘मत्स्य (एमएटीएसवाईए)-6000’ परियोजना में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में इसकी जानकारी दी।
मंत्री ने बताया कि ‘मत्स्य-6000’ को सफलतापूर्वक डिज़ाइन कर लिया गया है और इसके ‘गीले/बंदरगाह परीक्षण’ पूरे हो चुके हैं। जनवरी-फरवरी 2025 में किए गए इन परीक्षणों के दौरान तैरन क्षमता, वाहन स्थिरता, संचालन क्षमता, ऊर्जा आपूर्ति, संचार एवं नियंत्रण उपकरणों के साथ मानव सहायता एवं सुरक्षा प्रणालियों की कार्यक्षमता का सफल प्रदर्शन किया गया।
हालांकि, 500 मीटर के उथले जल में गोताखोरी के लिए आवश्यक एक महत्वपूर्ण घटक—विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया सिंटैक्टिक-फोम—अभी तैयार नहीं हो पाया है। यह फोम भारत द्वारा डिज़ाइन किया जा रहा है, जबकि इसका निर्माण यूरोप की एक नामित कंपनी द्वारा किया जा रहा है। विनिर्माण में आई तकनीकी खामी के कारण इसमें देरी हुई है, लेकिन इसके मई 2026 के अंत तक भारत पहुंचने की उम्मीद है। इसके बाद एकीकरण और परीक्षण प्रक्रिया पूरी कर इस वर्ष की अंतिम तिमाही में उथले जल में गोताखोरी की योजना है।
मंत्री ने यह भी बताया कि राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नई के माध्यम से समुद्र तल खनन प्रणाली विकसित की गई है, जो बहुधात्विक पिंडों को एकत्रित और कुचलने में सक्षम है। इस प्रणाली का परीक्षण वर्ष 2021 में मध्य हिंद महासागर में 5,270 मीटर की गहराई पर किया जा चुका है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ष 2025 तक 5,270 मीटर की गहराई पर किसी नई गहरे समुद्री खनन प्रणाली का परीक्षण नहीं हुआ है। साथ ही, वाणिज्यिक खनन अभी अंतर्राष्ट्रीय समुद्रतल प्राधिकरण द्वारा विकसित की जाने वाली संहिता के अधीन है, जो अभी लंबित है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय “नीली अर्थव्यवस्था” के संसाधनों के सतत विकास के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी बढ़ावा दे रहा है। इसके लिए विभिन्न उपायों के साथ निविदा प्रक्रिया अपनाई जा रही है, ताकि इस क्षेत्र में निवेश और नवाचार को प्रोत्साहन मिल सके।
