इटावा। सरकार ने वर्ष 2005 में खेल को अनिवार्य विषय घोषित किया था और वर्ष 2007-08 से खेल विषय के अंक परीक्षाओं में जुड़ने शुरू हो गए थे। इसके बाद खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बना दिया गया। इससे बुनियादी शिक्षा के साथ-साथ खेलों को भी बढ़ावा देने की नीति लागू की गई थी, लेकिन सरकार विद्यालयों में खेल की सुविधाएं उपलब्ध कराने में नाकाम रही।
जनपद में कुल 1,484 परिषदीय विद्यालय हैं, जिनमें से केवल 41 विद्यालय शहर में स्थित हैं, जबकि बाकी 1,443 विद्यालयों में लगभग 90 प्रतिशत विद्यालयों में खेल मैदान का अभाव है। ऐसी स्थिति में परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को विद्यालय और संकुल स्तर पर खेलकूद की गतिविधियों के लिए नजदीकी इंटर कॉलेज के खेल मैदान पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि इंटर कॉलेज के मैदान की सुविधा नहीं मिलती, तो परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को सड़क पर दौड़ प्रतियोगिताओं का आयोजन करना पड़ता है।
इसके अलावा, विद्यालयों में खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा तो बना दिया गया है, लेकिन इसे पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षकों की व्यवस्था नहीं की गई है। अधिकांश विद्यालयों में काम चलाऊ शिक्षकों से शारीरिक शिक्षा का पाठ्यक्रम पढ़वाया जा रहा है। इस विषय में एक प्रधानाध्यापक ने बताया कि जब से खेल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है, उन्हें इस काम में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पढ़ाने के लिए विशेषज्ञ शिक्षक नहीं हैं और बच्चों की खेलकूद गतिविधियों के लिए प्रशिक्षित कोचों का भी अभाव है।
सरकार ने खेल को अनिवार्य विषय घोषित करते समय यह बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया कि विद्यालयों में खेल की बुनियादी सुविधाएं और प्रशिक्षित शिक्षक होना चाहिए। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार को जल्द ही कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि बच्चों की खेलकूद गतिविधियों में कोई बाधा न आए और उनकी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके।
