भरथना (रिपोर्ट- तनुज श्रीवास्तव, 9720063658)- जीवात्मा को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति के लिए यह मानव शरीर मिला है। अगर मनुष्य सतकर्मों को करता हुआ सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए परोपकार का कार्य करता है, वह मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
उक्त बात कस्बा के मुहल्ला गली गोदाम के महर्षि दयानन्द मार्ग स्थित आर्य समाज मन्दिर में चल रहे पाँच दिवसीय 103वें भव्य वार्षिकोत्सव के अवसर पर विश्व कल्याण महायज्ञ व वेदकथा की अमृत वर्षा के दौरान वैदिक प्रवक्ता आचार्य हरीशंकर अग्निहोत्री ने कही। उन्होंने कहा कि कर्म दो प्रकार के होते हैं, एक सकाम कर्म एक निष्काम कर्म। सकाम कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं, शुभ कर्म (पुण्य), अशुभ कर्म (पाप) और मिश्रित कर्म (पुण्य के साथ अनजाने में पाप कर्म) होते हैं।
ऐसे ही निष्काम कर्म वो होते हैं, जिनमें हर कर्म को करते हुए ईश्वर प्राप्ति का ध्येय होता है, जब मनुष्य निष्काम होते हुए कर्म करता है, तो वह अपने कर्माे से किसी को हानि तो कभी भी नहीं पहुंचा सकता है, अपितु सबके भले के लिए ही कार्य करता है। हमेशा श्रेष्ठ ही कर्म करता है और श्रीराम, श्रीकृष्ण, महर्षि दयानन्द, सुभाष चन्द्र बोस, महारानी लक्ष्मीबाई इत्यादि की तरह सदैव के लिये अमरता को प्राप्त करता है। इस मौके पर प्रधान अनिल आर्य, मंत्री मोहन आर्य, कोषाध्यक्ष सतेन्द्र आर्य संजू, राजेश आर्य, राजकमल गुप्ता, अजय शर्मा, सत्यभान गुप्ता, रामलखन यादव सहित समस्त आर्य बन्धुओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
