मुलायम सिंह यादव : इटावा का वो बेटा, जिसने बदल दी देश की सियासत

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कभी-कभी इतिहास बड़े शहरों के महलों में नहीं, बल्कि गांव की कच्ची पगडंडियों और खेतों की मिट्टी में जन्म लेता है। 22 नवंबर 1939 को इटावा की धरती पर बसे छोटे से गांव सैफई में भी एक ऐसी ही कहानी ने जन्म लिया। एक साधारण किसान परिवार के घर जन्मा वह बालक आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा नाम बना, जिसे देश ने ‘नेता जी’ के रूप में जाना। उस समय शायद सैफई के किसी व्यक्ति ने कल्पना भी नहीं की होगी कि सुघर सिंह यादव के घर जन्म लेने वाला यह बालक एक दिन उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर तक पहुंचेगा और देश की सरकार में रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभालेगा। मिट्टी के आंगन से शुरू हुई यह यात्रा आसान नहीं थी। इसके रास्ते में गरीबी थी, संघर्ष था, आंदोलन थे, जेल की सलाखें थीं, चुनावी हार थी और फिर जीत भी थी। लेकिन हर मोड़ पर मुलायम सिंह अपने गांव, अपने लोगों और अपनी जमीन से जुड़े रहे।

सैफई उनके लिए सिर्फ जन्मस्थान नहीं था, बल्कि उनकी पहचान, उनकी स्मृतियों और उनके संघर्षों की पहली पाठशाला था। यही वह मिट्टी थी, जिसने एक किसान के बेटे को पहले पहलवान बनाया, फिर शिक्षक, फिर आंदोलनकारी और आखिरकार उत्तर प्रदेश का तीन बार मुख्यमंत्री तथा देश का रक्षा मंत्री बनाया। यह कहानी सिर्फ एक राजनेता की नहीं, बल्कि उस बालक की है जिसने अपनी आंखों से गांव की गरीबी देखी, खेतों में किसान का पसीना देखा और उसी समाज के बीच रहकर अपनी राजनीतिक राह बनाई। यह कहानी है सैफई से निकले उस मुलायम सिंह यादव की, जिसकी जिंदगी संघर्ष से शुरू हुई और इतिहास में दर्ज हुई।

मुलायम सिंह यादव के परिवार की कहानी भी संघर्ष से भरी थी। उनके बाबा खड़गजीत सिंह अत्यंत गरीबी के कारण इटैली, तहसील शिकोहाबाद से अपनी ससुराल सैफई आकर बसे थे। गांव वालों ने उन्हें केवल दामाद होने के नाते अपनाया ही नहीं, बल्कि गुजारे के लिए जमीन और रहने के लिए घर भी दिया। इसी सामाजिक सहयोग की छांव में परिवार आगे बढ़ा। खड़गजीत सिंह के पुत्रों में मेवाराम भी थे और उनके घर में सुघर सिंह का जन्म हुआ। आगे चलकर इसी परिवार में मुलायम सिंह का जन्म हुआ। यह कहानी बताती है कि उनकी जड़ें गांव, रिश्तों और संघर्ष की उस मिट्टी में थीं, जहां इंसान की पहचान उसके व्यवहार और मेहनत से बनती थी।

मुलायम सिंह बचपन से ही पढ़ाई में तेज और स्वभाव से जुझारू थे। सैफई जैसे छोटे गांव में उस दौर में शिक्षा के साधन बहुत सीमित थे, लेकिन उनके भीतर सीखने की ललक थी। परिवार की परिस्थितियों ने उन्हें मेहनत करना सिखाया और गांव के वातावरण ने लोगों के सुख-दुख को समझना। यही वजह थी कि बचपन से ही उनमें नेतृत्व के गुण दिखाई देने लगे थे। वे केवल किताबों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि समाज और आसपास की परिस्थितियों को भी ध्यान से देखते थे। बाद में उनके राजनीतिक जीवन में जो जनसरोकार दिखाई दिया, उसकी शुरुआती झलक इसी ग्रामीण बचपन में मिलती है।

सैफई के पूर्व प्रधान महेंद्र सिंह के प्रयासों से गांव में प्राथमिक पाठशाला की स्थापना हुई। चंदा एकत्र कर और सहयोग से बनी इस पाठशाला ने गांव के बच्चों के लिए शिक्षा का रास्ता खोला। मुलायम सिंह इसी पाठशाला के विद्यार्थियों में थे और उनकी कुशाग्र बुद्धि ने शिक्षकों का ध्यान आकर्षित किया। जिस भूमि पर कभी गांव की प्राथमिक पाठशाला हुआ करती थी, उसी क्षेत्र में आगे चलकर मेडिकल कॉलेज भी स्थापित हुआ। यह परिवर्तन अपने आप में सैफई के बदलते समय की कहानी है। एक छोटे से गांव की पाठशाला से शुरू हुई मुलायम सिंह की शिक्षा यात्रा आगे चलकर उच्च शिक्षा और सार्वजनिक जीवन तक पहुंची।

मुलायम सिंह यादव ने आगे चलकर राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया और बी.टी. की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे करहल के जैन इंटर कॉलेज में प्रवक्ता रहे। शिक्षक के रूप में उनका जीवन उन्हें युवाओं के और करीब ले गया। कक्षा में पढ़ाने वाला यह शिक्षक धीरे-धीरे समाज और राजनीति के बड़े सवालों से जुड़ता गया। शिक्षा ने उन्हें विचार दिए और ग्रामीण जीवन ने उन्हें जमीन से जोड़े रखा। किताबों में पढ़े सिद्धांतों और समाज में देखी असमानताओं के बीच उन्होंने अपने रास्ते तलाशने शुरू किए। अध्यापन उनके जीवन का स्थायी पड़ाव नहीं बना, लेकिन इस दौर ने उनके व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1961-62 में मुलायम सिंह यादव कर्मक्षेत्र महाविद्यालय, इटावा के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए। छात्र राजनीति ने उन्हें नेतृत्व का पहला बड़ा मंच दिया। यहां उन्होंने युवाओं की समस्याओं को समझा और संगठन के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया। छात्रसंघ का चुनाव भले ही विधानसभा या संसद जितना बड़ा नहीं था, लेकिन यही वह मंच था जिसने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को मजबूती दी। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे युवा नेता की बनी जो संघर्ष करने से पीछे नहीं हटता था। छात्र राजनीति से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर प्रदेश और देश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने वाला था।

मुलायम सिंह यादव के व्यक्तित्व में कुश्ती का भी विशेष स्थान था। वे अच्छे पहलवान थे और आगरा मंडल के कुश्ती चैंपियन के रूप में भी पहचान बनाई। अखाड़े की मिट्टी ने उन्हें केवल शारीरिक ताकत नहीं दी, बल्कि अनुशासन, धैर्य और मुकाबले की भावना भी दी। दंगल में उनका एक मुकाबला ऐसा भी रहा जिसमें उन्होंने अपने से लगभग दोगुने दिखाई देने वाले पहलवान को चित कर दिया। इस मुकाबले ने चौधरी नत्थू सिंह का ध्यान उनकी ओर खींचा। यही मुलाकात आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई।

चौधरी नत्थू सिंह जसवंतनगर क्षेत्र के प्रभावशाली नेता थे और कुश्ती में विशेष रुचि रखते थे। दंगल में मुलायम सिंह की प्रतिभा देखकर वे प्रभावित हुए। बातचीत और जानकारी लेने के बाद उन्हें पता चला कि यह युवा केवल पहलवान ही नहीं, बल्कि राजनीति में भी रुचि रखता है और छात्र राजनीति में सक्रिय रह चुका है। नत्थू सिंह ने मुलायम सिंह में भविष्य के नेता की संभावना देखी। शुरुआत में कुछ लोगों ने उनके चुनाव लड़ने का विरोध किया, लेकिन नत्थू सिंह अपने निर्णय पर कायम रहे। आखिरकार 1967 में जसवंतनगर विधानसभा सीट से मुलायम सिंह को चुनाव मैदान में उतारा गया।

1967 का चुनाव मुलायम सिंह यादव के जीवन का ऐतिहासिक मोड़ था। जसवंतनगर की जनता ने इस युवा चेहरे पर भरोसा जताया और वे पहली बार विधानसभा पहुंचे। यह केवल एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि सैफई और आसपास के ग्रामीण क्षेत्र से निकले एक युवा के लिए बड़े राजनीतिक सफर की शुरुआत थी। चुनाव प्रचार के दौरान संसाधन सीमित थे, लेकिन लोगों के बीच उनका संपर्क मजबूत था। सुभाष यादव के अनुसार, उस चुनाव में मोटरसाइकिल से प्रचार का अनुभव भी मुलायम सिंह के जीवन की यादगार घटनाओं में रहा। एक साधारण युवा अब विधानसभा की राजनीति में कदम रख चुका था।

1967 में जसवंतनगर से पहली बार विधायक बनने के बाद मुलायम सिंह यादव ने लगातार राजनीति में अपनी जगह मजबूत की। अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों और दलों के दौर से गुजरते हुए उन्होंने जनता के बीच अपनी पहचान कायम रखी। 1974 में वे फिर विधानसभा पहुंचे और 1977 में जनता पार्टी सरकार में सहकारिता और पशुपालन मंत्री बने। मंत्री रहते हुए सहकारी संस्थाओं में अनुसूचित जातियों के आरक्षण और किसानों को दिए जाने वाले सहकारी ऋणों पर ब्याज दर कम करने जैसे निर्णयों का उल्लेख उनकी राजनीतिक यात्रा में मिलता है।

मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक जीवन आंदोलनों और जेल यात्राओं से भी जुड़ा रहा। आपातकाल के दौरान उन्होंने लंबा समय जेल में बिताया। कुल मिलाकर विभिन्न आंदोलनों के कारण वे कई बार जेल गए और तीन वर्ष से अधिक समय तक कारावास में रहे। जेल की कठिन परिस्थितियों ने उनके राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया, लेकिन उनका सार्वजनिक जीवन वहीं नहीं रुका। संघर्ष उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बनता गया। जेल से बाहर आने के बाद वे फिर जनता के बीच सक्रिय हुए और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।

1980 में मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश लोकदल के अध्यक्ष बने। बाद में उन्होंने विभिन्न राजनीतिक संगठनों के साथ काम किया और 1982 में विधान परिषद के सदस्य बने। वे विधान परिषद में विपक्ष के नेता रहे। 1985 में विधानसभा में भी विपक्ष के नेता बने। इस तरह वे उत्तर प्रदेश विधानमंडल के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता रहने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और किसान तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों को लगातार उठाया। उनकी राजनीतिक शैली में संघर्ष और संगठन दोनों का प्रभाव साफ दिखाई देता था।

राजनीति का रास्ता हमेशा आसान नहीं रहा। 1980 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद मैनपुरी के कुर्रा थाना क्षेत्र में एक समारोह के दौरान उन पर हमला हुआ। इस घटना में उनके एक साथी अध्यापक की मृत्यु हुई और एक अन्य व्यक्ति गोली लगने से जीवनभर के लिए प्रभावित हुए। इस घटना ने उनके राजनीतिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी। संघर्ष और जोखिम से भरी राजनीति के बावजूद मुलायम सिंह पीछे नहीं हटे। समय के साथ उनकी राजनीतिक पकड़ बढ़ती गई और वे उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल होते चले गए।

मुलायम सिंह यादव पर डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। सामाजिक असमानता, पिछड़े वर्गों की समस्याएं और कमजोर वर्गों के अधिकार उनके राजनीतिक चिंतन का हिस्सा बने। वे लोहिया के विचारों से संबंधित साहित्य और समाचार पत्रों को पढ़ते थे। लोहिया के विचारों ने उन्हें यह समझने की दिशा दी कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सवालों को उठाने का भी रास्ता हो सकती है। अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण आधार बनी।

मुलायम सिंह यादव की राजनीति में किसानों, मजदूरों, युवाओं, छात्रों, दलितों, पिछड़ों और कमजोर वर्गों के मुद्दे लगातार दिखाई दिए। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के किसान केंद्रित विचारों से भी वे प्रभावित हुए। ग्रामीण भारत की समस्याओं को उन्होंने केवल राजनीतिक भाषणों का विषय नहीं बनाया, बल्कि अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्हें लगातार उठाया। यही कारण था कि ग्रामीण क्षेत्रों में उनका एक मजबूत जनाधार बना। उनके समर्थकों के लिए वे केवल नेता नहीं, बल्कि अपने बीच से निकला ऐसा व्यक्ति थे जो गांव की भाषा, किसान की चिंता और गरीब परिवार की परेशानी को समझता था।

1989 का वर्ष मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन में ऐतिहासिक बन गया। जनता दल के टिकट पर जसवंतनगर से जीतने के बाद वे 3 दिसंबर 1989 को जनता दल विधायक दल के नेता चुने गए। दो दिन बाद, 5 दिसंबर 1989 को उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। सैफई का वह किसान परिवार अब उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुका था। मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके लिए लंबे संघर्ष का परिणाम थी। एक युवा पहलवान, शिक्षक और आंदोलनकारी अब पूरे प्रदेश की सरकार का नेतृत्व कर रहा था।

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी किसानों के सवाल उनके राजनीतिक जीवन के केंद्र में रहे। 1992 में किसानों के हितों को लेकर उन्होंने प्रदेशव्यापी आंदोलन किया। रामकोला, देवरिया में किसानों पर पुलिस कार्रवाई और गन्ना मूल्य भुगतान जैसे मुद्दों को लेकर उन्होंने संघर्ष किया और जेल भी गए। इस दौर में उनका राजनीतिक व्यक्तित्व आंदोलन और सत्ता दोनों के बीच दिखाई देता है। वे सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री भी थे और जरूरत पड़ने पर आंदोलन की राजनीति करने वाले नेता भी। किसानों के मुद्दों पर उनकी सक्रियता ने उनके समर्थकों के बीच उनकी ‘किसान नेता’ की छवि को और मजबूत किया।

29 सितंबर 1992 को मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी के गठन की घोषणा की। 4 नवंबर 1992 को लखनऊ में पार्टी का पहला स्थापना सम्मेलन हुआ, जहां पार्टी का संविधान और कार्यक्रम घोषित किए गए। यह उनके राजनीतिक जीवन का नया अध्याय था। समाजवादी विचारधारा को आधार बनाकर उन्होंने एक नए राजनीतिक संगठन का निर्माण किया। आने वाले वर्षों में यही पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति की एक महत्वपूर्ण शक्ति बनी। समाजवादी पार्टी का गठन मुलायम सिंह यादव की संगठन क्षमता और उनके लंबे राजनीतिक अनुभव का परिणाम भी था।

1993 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव कई सीटों से चुनाव जीते और समाजवादी पार्टी विधायक दल के नेता बने। 4 दिसंबर 1993 को उन्होंने दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की गठबंधन सरकार का उन्होंने जून 1995 तक नेतृत्व किया। यह दौर उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलावों का समय था। मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक यात्रा अब प्रदेश की सीमाओं से आगे बढ़ रही थी। वे राष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने लगे थे।

1996 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मैनपुरी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। विधानसभा से संसद तक का यह सफर उनके राजनीतिक जीवन का नया विस्तार था। उसी वर्ष केंद्र में बनी सरकार में उन्हें रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी मिली। उत्तर प्रदेश के गांवों और किसानों के मुद्दों से जुड़े नेता के सामने अब देश की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां थीं। यह उनके लिए व्यक्तिगत रूप से भी महत्वपूर्ण पड़ाव था। सैफई से शुरू हुई उनकी यात्रा अब नई दिल्ली के सत्ता गलियारों तक पहुंच चुकी थी।

रक्षा मंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव का कार्यकाल उनके राजनीतिक जीवन का अलग अध्याय था। एच.डी. देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार और बाद में इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व वाली सरकार में भी उन्होंने रक्षा मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इस प्रकार वे केंद्र सरकार में दो बार रक्षा मंत्री रहे। देश की सुरक्षा और सेना से जुड़े इस पद ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्रीय नेता से लेकर भारत सरकार के रक्षा मंत्री तक का सफर उनके जीवन की असाधारण राजनीतिक यात्रा को दर्शाता है।

1998 में वे संभल लोकसभा सीट से निर्वाचित हुए। इसी दौर में उन्होंने लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चे के गठन में भूमिका निभाई और उन्हें इसका अध्यक्ष मनोनीत किया गया। 1999 में वे संभल और कन्नौज दोनों लोकसभा क्षेत्रों से निर्वाचित हुए। उनकी राजनीति अब केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रह गई थी। संसद में उनकी मौजूदगी और क्षेत्रीय दलों के साथ उनके संबंधों ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया।

25 अगस्त 2003 को मायावती के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिर बड़ा बदलाव हुआ। मुलायम सिंह यादव ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और 28 अगस्त 2003 को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह उनकी राजनीतिक वापसी का महत्वपूर्ण क्षण था। इस कार्यकाल में उन्होंने विकास, उद्योग और ऊर्जा से जुड़ी नीतियों पर भी जोर दिया। एक बार फिर लखनऊ की सत्ता की कमान उसी नेता के हाथों में थी, जिसकी राजनीतिक यात्रा सैफई के गांव और इटावा के अखाड़े से शुरू हुई थी।

मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा की सदस्यता आवश्यक होने पर मुलायम सिंह यादव ने जनवरी 2004 में बदायूं की गुन्नौर विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ा। उन्हें 1,95,213 मत मिले, जो कुल पड़े मतों का 91.45 प्रतिशत था। यह जीत उनकी राजनीतिक यात्रा की चर्चित चुनावी जीतों में शामिल रही। मुख्यमंत्री रहते हुए जनता से मिले इस समर्थन ने उनके राजनीतिक प्रभाव को दर्शाया। चुनावी आंकड़े केवल संख्या होते हैं, लेकिन किसी नेता के लिए वे उस समय के जनसमर्थन की तस्वीर भी पेश करते हैं।

तीसरे कार्यकाल में उत्तर प्रदेश विकास परिषद के गठन और नई औद्योगिक तथा ऊर्जा नीति पर जोर दिया गया। दादरी में बड़े गैस आधारित बिजली संयंत्र की स्थापना की प्रक्रिया भी इसी दौर में शुरू हुई। सरकार ने उद्योगों और निवेश को उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा से जोड़ने का प्रयास किया। मुलायम सिंह यादव की राजनीति में किसान और ग्रामीण समाज के मुद्दों के साथ विकास और उद्योग का यह पक्ष भी दिखाई देता है। उनका तीसरा कार्यकाल इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इस दौरान प्रदेश में औद्योगिक निवेश और ऊर्जा क्षेत्र को लेकर कई बड़े प्रस्ताव सामने आए।

मुलायम सिंह यादव का विधानसभा चुनावी सफर कई दशकों तक चला। 1967 में जसवंतनगर से जीत के बाद 1969 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1974, 1977, 1985, 1989 और 1991 में वे फिर जीतते रहे। 1993 में उन्होंने तीन विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और तीनों में जीत हासिल की। 1996 में दो सीटों से और 2007 में भी दो सीटों से चुनाव जीतने का उल्लेख मिलता है। इस लंबे सफर में जीत और हार दोनों आईं, लेकिन उन्होंने राजनीतिक संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा।

1996 में मैनपुरी से शुरू हुआ उनका लोकसभा सफर भी लगातार आगे बढ़ा। 1998 और 1999 में संभल से तथा 1999 में कन्नौज से भी वे निर्वाचित हुए। 2004, 2009, 2014 एवं 2019 में वे फिर मैनपुरी से लोकसभा पहुंचे। संसद में उनका अनुभव राज्य की राजनीति से अलग था, लेकिन किसानों, ग्रामीण समाज और सामाजिक न्याय के सवाल उनके राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने रहे। लोकसभा में पहुंचने के बाद भी सैफई और इटावा से उनका संबंध बना रहा। राष्ट्रीय राजनीति में ऊंचा मुकाम हासिल करने के बावजूद उनकी पहचान अपनी जमीन से जुड़े नेता की बनी रही।

10 अक्टूबर 2022। यह तारीख आते ही सैफई की हवा जैसे कुछ पल के लिए ठहर जाती है। जिस धरती ने एक बालक को जन्म लेते देखा था, उसी धरती ने उस दिन अपने बेटे को अंतिम विदाई दी। 82 वर्षों की जीवन यात्रा पूरी करके मुलायम सिंह यादव इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके जाने के साथ उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। एक किसान परिवार से निकला वह बालक, जिसने अखाड़े की मिट्टी में संघर्ष सीखा, जिसने छात्र राजनीति से शुरुआत की, जिसने आंदोलनों में जेल देखी, जिसने विधानसभा में आवाज उठाई, जिसने तीन बार उत्तर प्रदेश की कमान संभाली और जिसने देश के रक्षा मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई—वह अपने पीछे एक लंबा राजनीतिक अध्याय छोड़ गया।

सैफई आज भी है, खेत आज भी हैं, पगडंडियां आज भी हैं… लेकिन उस मिट्टी की एक आवाज हमेशा के लिए खामोश हो चुकी है। फिर भी जब सैफई का नाम लिया जाएगा, जब उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, जब समाजवादी आंदोलन की चर्चा होगी, तब मुलायम सिंह यादव का नाम जरूर आएगा। उनकी राजनीति को लेकर अलग-अलग विचार और मूल्यांकन हो सकते हैं, लेकिन उनके जीवन का संघर्ष, उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा और जनता के बीच उनकी पहचान भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। आज भी उनकी तस्वीर के सामने खड़े होकर लोग कहते हैं—“नेता जी चले गए, लेकिन उनकी यादें नहीं गईं।” सैफई की मिट्टी में उनकी स्मृतियां हैं, उनके संघर्ष की कहानी है और उस बालक की कहानी है जिसने छोटे से गांव से निकलकर देश के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया।

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Ashish Bajpai
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