चंबल क्षेत्र का नाम लंबे समय तक बीहड़ों और पिछड़ेपन की छवि से जुड़ा रहा है। ऐतिहासिक कारणों और भौगोलिक चुनौतियों के चलते यह इलाका विकास की मुख्यधारा से काफी समय तक दूर रहा। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में विशेषकर इटावा और उसके आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था और पर्यटन की दृष्टि से सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। इसके बावजूद, चंबल का समग्र विकास तब तक संभव नहीं है, जब तक इसके लिए एक अलग और समर्पित विशेष क्षेत्रीय विकास नीति लागू नहीं की जाती।
चंबल की भौगोलिक संरचना उत्तर प्रदेश के अन्य मैदानी जिलों से भिन्न है। यहां के बीहड़, रेतीली भूमि और चंबल नदी का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र सामान्य नीतियों को प्रभावी नहीं होने देता। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से इस क्षेत्र के लिए अलग नीति की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं। बीहड़ों के वैज्ञानिक समतलीकरण, मृदा संरक्षण और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर इस क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
पर्यटन चंबल क्षेत्र की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। चंबल नदी को विश्व की स्वच्छ नदियों में गिना जाता है और यह घड़ियाल, मगरमच्छ तथा दुर्लभ गंगा डॉल्फिन जैसे जीवों का प्राकृतिक आवास है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और इटावा लायन सफारी को जोड़कर एक संगठित पर्यटन सर्किट विकसित किया जा सकता है, जो देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखता है।
इसके अतिरिक्त, बटेश्वर मंदिर समूह जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। रिवर सफारी, नियंत्रित बोटिंग और इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियां स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती हैं। इसके लिए सरकार द्वारा विशेष पर्यटन नीति, निवेशकों को प्रोत्साहन, सिंगल विंडो क्लीयरेंस और सुरक्षा व्यवस्था का स्पष्ट ढांचा आवश्यक है।
औद्योगिक विकास के दृष्टिकोण से चंबल क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योग, फूड प्रोसेसिंग, डेयरी, हस्तशिल्प और सौर ऊर्जा परियोजनाओं की पर्याप्त संभावनाएं हैं। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन होगा, बल्कि युवाओं के पलायन पर भी रोक लगेगी। स्थानीय लोगों को पर्यटन, होम-स्टे और पारंपरिक कारीगरी से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
कनेक्टिविटी के क्षेत्र में आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे ने नए अवसर खोले हैं, लेकिन बीहड़ क्षेत्र के आंतरिक गांवों को सड़कों और डिजिटल नेटवर्क से जोड़ना अब भी एक बड़ी चुनौती है। विकास के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि चंबल का नाजुक इकोसिस्टम प्रभावित न हो।
कुल मिलाकर, चंबल क्षेत्र अब केवल अतीत की छवि से पहचाना जाने वाला इलाका नहीं रहा। यदि नीतिगत इच्छाशक्ति के साथ विशेष क्षेत्रीय नीति लागू की जाए, तो चंबल और इटावा क्षेत्र उत्तर प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
– विकास भदौरिया

